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न जलाया जाता है और न ही दफनाया... फिर कैसे होता है अघोरी साधु का दाह संस्कार? जानकर रूह कांप जाएगी!
How Last Rites of an Aghori Sadhu performed : संगम नगरी प्रयागराज में महाकुंभ 2025 का गंगा स्नान जारी है, जहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में घाटों पर पहुंचे हैं। महाकुंभ में अघोरी बाबा और नागा साधु विशेष आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। अघोरियों के जीवन और रहस्यमय परंपराओं को लेकर लोगों में जिज्ञासा रहती है। कहा जाता है कि अघोरी साधु श्मशान में ध्यान लगाते हैं और मानव खोपड़ी (नर मुंड) को पूजा का हिस्सा मानते हैं।
इंसानी मांस खाने जैसी धारणाएं उनकी रहस्यमय जीवनशैली से जुड़ी हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि जितनी रहस्यमयी अघोरियों का जीवन होता है उसी तरह उनके मरने के बाद भी अंतिम संस्कार बेहद रहस्यमी तरीके से होता है। इन्हें न तो जलाया जाता है न हीं दफनाया जाता है, आइए जानते हैं कि अघोरी के मरने के बाद इनके शव के साथ क्या किया जाता है?

40 दिन तक चलती है अंतिम संस्कार की प्रक्रिया
अघोरी साधु धर्म की रक्षा के लिए समर्पित माने जाते हैं। उनकी मृत्यु के बाद उनका शव जलाया नहीं जाता। शव को चौकड़ी में उलटा रखा जाता है, सिर नीचे और पैर ऊपर। सवा माह तक शव में कीड़े पड़ने का इंतजार किया जाता है। इसके बाद मुंडी को छोड़ बाकी शरीर को गंगा में बहा दिया जाता है, जिससे मान्यता है कि उनके पाप धुल जाते हैं। मुंडी की 40 दिन की विशेष क्रिया होती है, जिसमें शराब डाली जाती है। कहा जाता है कि साधना के प्रभाव से मुंडी उछलने लगती है, आवाज देती है और शराब मांगती है। इसे तंत्र शक्तियों का प्रतीक माना जाता है, जो उनकी तपस्या और साधना का प्रमाण है।
क्यों गंगा में बहा देते हैं लाश?
अघोरी की मृत्यु पर उनका अंतिम संस्कार नहीं किया जाता, बल्कि लाश को गंगा में बहा दिया जाता है। यह माना जाता है कि इससे उनके सभी पाप धुल जाते हैं। जो बातें आम लोगों को अजीब और वीभत्स लगती हैं, वे अघोरियों के जीवन और उनकी साधना का अभिन्न हिस्सा होती हैं, जो उन्हें अद्वितीय बनाती हैं।
इसलिए पीते हैं हमेशा चिलम
अघोरी हर इंसान को समान मानते हैं और गंदगी व अच्छाई में भेद नहीं करते। उनका तर्क है कि जैसे अबोध बच्चे को गंदगी और भोजन में अंतर नहीं समझ आता, वैसे ही वे सब कुछ समान दृष्टि से देखते हैं। अघोरी बनने के लिए श्मशान में 12 साल की तपस्या जरूरी है। अक्सर उन्हें चिलम पीते देखा जाता है। वे मानते हैं कि गहन साधना के दौरान गांजा पीने से प्रबल आध्यात्मिक अनुभव होते हैं और बीमारियां व समस्याएं दूर रहती हैं।
अघोरी का नहीं होता है कोई ठिकाना
अघोरी किसी एक जगह पर नहीं टिकते, लेकिन बनारस में वे लंबे समय तक रहते हैं। यहां अघोरियों का एक मंदिर है, जहां गांजा और शराब का चढ़ावा चढ़ता है। अघोरी शिव और शव के उपासक होते हैं। शिव के पांच स्वरूपों में से एक स्वरूप 'अघोर' है। अघोरी शिव की उपासना के लिए शव पर बैठकर साधना करते हैं, इसलिए शिव को श्मशान का देवता माना जाता है। यह साधना उन्हें आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है।
हठधर्मिता और तप से जाने जाते है अघोरी
अघोरी साधु अपनी हठधर्मिता और तप के लिए जाने जाते हैं। वे किसी भी बात पर अड़ जाएं, तो उसे पूरा किए बिना नहीं मानते। अधिकतर अघोरियों की आंखें लाल होती हैं, जो गुस्से का संकेत लगती हैं, लेकिन वे मन से शांत होते हैं। अघोरी भगवान शिव के भक्त होते हैं और अपना जीवन शिव को समर्पित करते हैं। वे आम लोगों से दूर रहते हैं, उनके साथ उनके शिष्य ही रहते हैं, जो उनकी सेवा करते हैं और साधना में सहयोग देते हैं।



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