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Munawwar Rana Shayari on Maa: 'मां' पर शायरी कर दुनिया में मशहूर हुए मुनव्वर राना, यहां पढ़ें उनकी बेस्ट शायरी
Munawwar Rana Ki Maa Par Likhi Famous Shayari: चांद, सितारे, दोस्ती, प्यार, प्रेमिका, नदी, झरने न जाने और कितने ही ऐसे विषय हैं जिनपर शायर अपनी लेखनी का कमाल दिखाते हैं। इन विषयों से प्रेरणा लेकर वो अपनी रचना करते हैं।
इसी बीच मुनव्वर राना एक ऐसा नाम बनकर उभरे जिन्होंने अपनी शेरो-शायरी में मां और उसके प्रेम के अलग अलग रंगों को अपनी रचनाओं में उकेरा। उनकी लेखनी का कमाल ऐसा की चंद पंक्तियों में ही मां का अपने बच्चे के प्रति स्नेह का समंदर नजर आ जाता है।

मुनव्वर राना की कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें माँ, ग़ज़ल गाँव, पीपल छाँव, बदन सराय, नीम के फूल, सब उसके लिए, घर अकेला हो गया, कहो ज़िल्ले इलाही से, बग़ैर नक़्शे का मकान, फिर कबीर, नए मौसम के फूल आदि शामिल हैं।
उर्दू साहित्य में अपना बेशकीमती योगदान देने वाले मुनव्वर राना आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी रचनाएं हमेशा लोगों के बीच जीवंत रहेंगी। आइये आज उनकी मां पर लिखी उन शायरी को एक बार फिर पढ़ते हैं जिसने उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाया।
1.
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई,
मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में माँ आई।
2.
अभी जिंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा,
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है।
3.
घेर लेने को जब भी बलाएँ आ गईं,
ढाल बनकर माँ की दुआएँ आ गईं।
4.
वह कबूतर क्या उड़ा छप्पर अकेला हो गया,
माँ के आंखें मूँदते ही घर अकेला हो गया।
चलती फिरती हुई आँखों से अज़ाँ देखी है,
मैंने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखी है।
5.
लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती,
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती
अब भी चलती है जब आँधी कभी ग़म की 'राना'
माँ की ममता मुझे बाहों में छुपा लेती है।
6.
छू नहीं सकती मौत भी आसानी से इसको,
यह बच्चा अभी माँ की दुआ ओढ़े हुए है।
7.
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है,
माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है।
मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ,
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ
8.
सिसकियाँ उसकी न देखी गईं मुझसे 'राना'
रो पड़ा मैं भी उसे पहली कमाई देते
मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना।
9.
लिपट को रोती नहीं है कभी शहीदों से,
ये हौसला भी हमारे वतन की मांओं में है।
ये ऐसा कर्ज है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता,
मैं जब तक घर न लौटूं मेरी माँ सज़दे में रहती है।
10.
जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है,
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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