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Prada के नए कलेक्शन में दिखी ‘कोल्हापुरी चप्पल की कॉपी, लाखों में है कीमत, जानें इसकी खासियत
हाल ही में प्राडा (Prada) के स्प्रिंग समर 2026 शो में एक सैंडल ने सबका ध्यान खींचा, जो हू-ब-हू हमारी देसी कोल्हापुरी चप्पल जैसी थी। इसकी कीमत 1.20 लाख रुपये से भी ज्यादा बताई जा रही है। इस पर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है, क्योंकि प्राडा ने इस डिजाइन को पेश करते वक्त न तो भारत का जिक्र किया और न ही कोल्हापुर के कारीगरों को कोई क्रेडिट दिया। फैशन प्रेमी और हस्तशिल्प को मानने वाले इस बात से नाराज हैं कि इंटरनेशनल ब्रांड्स कब भारतीय परंपराओं को पहचान देंगे।
हालांकि इस कंट्रोवर्सी के बाद अब हर कोई कोल्हापुरी चप्पलों के बारे में जानना चाहता है, आपको बता दें कि इसके इतिहास और अनोखी बनावट की वजह से इसे GI टैग मिल चुका है।आइए जानते हैं कि असली कोल्हापुरी चप्पल कैसी होती हैं, कहां बनती है और इनकी खासियत क्या है?

कोल्हापुरी चप्पल की खासियत
कोल्हापुरी चप्पल की शुरुआत महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले से मानी जाती है और इसका इतिहास 13वीं शताब्दी से जुड़ा है। यह चप्पलें शुरुआत में मराठा योद्धाओं और ग्रामीण समुदायों द्वारा पहनी जाती थीं। इनकी खास बनावट इन्हें गर्मी में ठंडक देने वाली और बरसात में टिकाऊ बनाती थी। यह पूरी तरह हाथ से बनाई जाती हैं और पारंपरिक लेदर कारीगरी का प्रतीक मानी जाती हैं। समय के साथ यह चप्पलें भारत ही नहीं, विदेशों में भी फैशन और कंफर्ट का हिस्सा बन चुकी हैं।
मिल चुका है GI टैग
इन चप्पलों की एक खास पहचान होती है - अंगूठे के पास बनी रिंग, जो इसकी ग्रिप को बेहतर बनाती है। साथ ही, इनकी पतली स्ट्रैप और हैंडवोवन पैटर्न इन्हें और भी यूनिक बनाते हैं। यही वजह है कि कोल्हापुरी चप्पल को GI टैग (Geographical Indication) भी मिला हुआ है।
कोल्हापुरी चप्पल से आती है आवाज
कोल्हापुरी चप्पल को पहनकर जब आप चलते हैं, तो एक खास किस्म की "टप-टप" आवाज सुनाई देती है। ये कोई डिज़ाइन की कमी नहीं बल्कि उसकी खासियत है। असल में, परंपरागत रूप से इन चप्पलों के सोल में बीज (seed pods) या विशेष प्रकार की सामग्री डाली जाती थी। वर्षों पहले जब किसान या ग्रामीण लोग जंगलों में जाते थे, तो इस आवाज का उद्देश्य था - जानवरों को सतर्क करना। जैसे ही कोई जानवर चप्पल की आवाज सुनता, वह भाग जाता। आज भी, यही परंपरा और तकनीक कुछ कारीगरों द्वारा बरकरार रखी जाती है। और यही कारण है कि असली कोल्हापुरी चप्पल से चलते समय एक अलग-सी आवाज आती है।
कितने साल चलते हैं कोल्हापुरी चप्पल?
कई लोग सोचते हैं कि कोल्हापुरी चप्पल का लुक बेहद साधारण होता है, तो इसकी कीमत इतनी ज्यादा क्यों? लेकिन जब आप इसकी कारीगरी, टिकाऊपन और परंपरा को समझते हैं, तो ये कीमत वाजिब लग सकती है। एक असली कोल्हापुरी चप्पल 10 साल तक चल सकती है। खासकर गर्मियों में यह सबसे आरामदायक फुटवियर मानी जाती है। इसका चमड़ा समय के साथ पहनने वाले के पैरों के आकार के अनुसार ढल जाता है, जिससे unmatched comfort मिलता है।



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