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जानें, स्वामी विवेकानंद के बारे में ऐसी बातें जो कोई नहीं जानता
स्वामी विवेकानंद एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने वेदांत दर्शन का विस्तार पश्चिम में किया और हिंदुत्व में सुधार किया। निर्धन होने के बावजूद उन्होंने शिकागो में होने वाली धर्म संसद में भाग लेने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा की। उन्होंने पूर्व के दर्शन शास्त्र में क्रांति ला दी तथा पश्चिमी देशों को यह स्वीकार करने के लिए बाध्य किया कि हिंदू दर्शन शास्त्र अन्य सभी शास्त्रों से बेहतर है।
स्वामी विवेकानंद का जन्म कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम नरेंद्र नाथ दत्ता था। विवेकानंद ने पूरे भारत का भ्रमण किया तथा गरीबों और ज़रुरतमंदों के उद्धार के लिए काम किया। उन्होंने प्रसिद्ध रामकृष्ण मिशन तथा कलकत्ता में बेलूर मठ की स्थापना की जो आज भी हिंदुत्व का प्रचार कर रहा है और ज़रुरतमंदों की सहायता करता है।
उनके आकर्षण ने युवाओं में देश के प्रति भावना को और देश के प्रति उन्हें उनके कर्तव्य निभाने के लिए उकसाया। परन्तु हम वास्तविक विवेकानंद के बारे में कितना जानते हैं? अधिक कुछ भी नहीं। अत: यहाँ स्वामी विवेकानंद के बारे में 10 तथ्य बताए गए हैं जो निश्चित ही आपके मस्तिष्क को झकझोर देंगे।

विवेकानंद एक औसत विद्यार्थी थे
विश्व उन्हें उनके वाक्पटु भाषणों के लिए जानता है। परंतु क्या आप जानते हैं कि एक विद्यार्थी के रूप में विवेकानंद एक औसत विद्यार्थी थे। उन्हें यूनिवर्सिटी की प्रवेश स्तर की परीक्षा में केवल 47 प्रतिशत अंक मिले, एफ़.ए. (बाद में यह परीक्षा इंटरमीडिएट आर्ट्स या आई ए बन गयी) की परीक्षा में 46 प्रतिशत अंक मिले और बी.ए. की परीक्षा में 56 प्रतिशत अंक मिले थे।

विवेकानंद एक उपार्जित नाम था
साधू बनने के बाद स्वामी विवेकानंद ने यह नाम धारण किया था। वास्तव में उनकी मां ने उनका नाम वीरेश्वर रखा था तथा उन्हें अक्सर बिली कहकर बुलाया जाता था। बाद में उनका नाम नरेंद्र नाथ दत्ता रखा गया।

विवेकानंद को कभी नौकरी नहीं मिली
बी.ए. की डिग्री होने के बावजूद स्वामी विवेकानंद को नौकरी की खोज में भटकना पड़ा। वे लगभग नास्तिक बन चुके थे क्योंकि भगवान से उनका विश्वास हिल गया था।

स्वामी जी के परिवार ने बहुत ग़रीबी में जीवन गुज़ारा
उनके पिता की मृत्यु के बाद स्वामी जी के परिवार ने बहुत गरीबी में जीवन बिताया। एक दिन के भोजन के लिए उनकी मां और बहन को बहुत संघर्ष करना पड़ता था। कई बार स्वामी जी दो दो दिनों तक भूखे रहते थे ताकि परिवार के अन्य लोगों को पर्याप्त भोजन मिल सके।

एक गोपनीय राज़
खेत्री के महाराजा अजीत सिंह स्वामीजी की मां को आर्थिक सहायता के तौर पर नियमित रूप से 100 रूपये भेजते थे। यह प्रबंध एकदम गोपनीय था।

विवेकानंद को चाय बहुत पसंद थी
विवेकानंद चाय के पारखी थे। उन दिनों में जब हिंदू पंडित चाय पीने का विरोध करते थे तब उन्होंने अपने मठ में चाय प्रारंभ की थी।

स्वामी और लोकमान्य
एक बार स्वामी जी ने बेलूर मठ में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को चाय बनाने के लिए राजी कर लिया। इस महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने जायफल, जावित्री, इलायची, लौंग और केसर को मिलाकर सबके लिए मुगलई चाय बनाई।

उन्होंने कभी भी रामकृष्ण पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया
रामकृष्ण परमहंस स्वामी विवेकानंद के गुरु थे। अपने गुरु से शिक्षा प्राप्त करने के प्रारंभिक दिनों में विवेकानंद ने कभी भी उनपर पूर्ण रूप से विश्वास नहीं किया। वे प्रत्येक बात पर रामकृष्ण की परीक्षा लेते थे और अंतत: अपना उत्तर प्राप्त करके ही रहते थे।

स्वामीजी ने अपनी मौत की भविष्यवाणी की थी
विवेकानंद ने फ्रेंच ओपेरा सोप्रानो रोज़ा एमा काल्वेत के दौरान घोषणा की थी कि उनकी मृत्यु 4 जुलाई को होगी। उनकी मृत्यु 4 जुलाई 1902 को हुई।

मृत्यु से पहले स्वामी जी को 31 बीमारियां हुई
प्रसिद्ध बंगाली लेखक "द मॉन्क एज मेन" पुस्तक के अनुसार स्वामी विवेकानंद को 31 बीमारियाँ थी। अनिद्रा, किडनी और लीवर से संबंधित बीमारियाँ, मलेरिया, माइग्रेन, डाइबिटीज़ और हृदय की बीमारी आदि 31 बीमारियों में से थी जिनका सामना विवेकानंद ने अपने जीवनकाल में किया। उन्हें अस्थमा भी था जो कभी कभी असहनीय हो जाता था। .



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