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साड़ी का हैरान करने वाला इतिहास, प्राचीन भारत से लेकर फैशन रनवे तक
भारत में साड़ी स्त्रीत्व का प्रतीक मानी जाती है। साड़ी 5,000 से अधिक सालों से अपने अस्तित्व में है, भारतीय साड़ी को दुनिया के सबसे पुराने परिधानों में से एक माना जाता है। वेद और सिंधु घाटी सभ्यता के इतिहास में महिलाओं के साड़ी का परिधान के रूम में पहनने के बारें उल्लेख हैं। साड़ी ने अपनी प्राचीनता को साथ लिये, आज के फैशन ट्रेंड में अपनी जगह बनाकर रखी हुई है। आज भी मेजर फैशन शो में रैंप पर, बॉलीवुड में, ग्रामीण और शहरी भारत की सड़कों पर साड़ी ने हमारी संस्कृति में अपनी जड़े जमाई हुईं हैं।
साड़ियों को कैसे बनाया और इसे कैसे पहना जाता है, ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप भारत के कौन से हिस्से में रहती हैं, क्योंकि भारत के हर हिस्से में साड़ी पहनने का तरीका अलग अलग है।

साड़ी का इतिहास
साड़ी के समान पोशाक का सबसे पुराना रिकॉर्ड सिंधु घाटी सभ्यता से है, जो 2800 और 1800 ईसा पूर्व के बीच विकसित हुआ था। भारत में आर्यों का प्रवेश के बाद ही देश का नया इतिहास विकसित हुआ था, वे इस देश में 'वस्त्र' शब्द लाने वाले पहले लोग थे। आर्य जैसे ही भारत के दक्षिणी क्षेत्र की ओर गये, उन्होंने कमर के चारों ओर कपड़ा लपेटने की शैली को अपनाया। महिलाओं ने कढ़ाई के साथ कलरफुल साड़ी पहनना शुरू कर दिया। Photo-wikipedia

भारतीय महिलाओं को पर्शियन और ग्रीक स्टाइल ने आकर्षित किया
पर्शियन और ग्रीक लोगों ने साड़ियों के फैशन में एक बड़ा चेंज किया था। यूनानी कमर पर एक बेल्ट (कमरबंड) पहनते थे, और फारसियों ने ऐसे कपड़े पहने थे जो कमर से होकर कंधे पर साथ होते थे। इस तरह से साड़ी में भी बदलाव आए और भारतीय महिलाओं को पर्शियन और ग्रीक स्टाइल ने आकर्षित किया और वे भी इस शैली को अपने फैशन के साथ मिक्स करने लगीं। सिलाई और सिले हुए कपड़े पहनने की कला भारत में शुरू हुई। भारत में सिलाई की कला की शुरुआत करने वाले फारसी थे। फारसियों ने भारत में मोतियों और अन्य कीमती पत्थरों के साथ कपड़ों को तराशने की कला को भी विकसित किया। उस समय की शाही महिलाओं ने रत्नों से सजे कपड़े पहने।

रेशमी साड़ियों का मॉर्डन स्टाइल मुगलों ने इजाद किया
मुगल, जिन्होंने भारतीय जीवन के हर पहलू में योगदान दिया, इसमें पोशाक भी शामिल है। उनके शासनकाल में भारत को साड़ियों में एक और बड़े बदलाव नजर आए। मुगलों को शानदार चनकीले स्टाइल और फैशन का शौक था। वे सिलाई की कला में स्किल्ड थे और रेशमी कपड़े उनके फेवरेट थे। रेशमी साड़ियों मॉर्डन स्टाइल की ऑरिजन इसी से शुरू हुआ। इस टाइम के दौरान कपड़े के लिए पांच सौ से अधिक नैचुरल कलर मौजूद थे।

बनारस की साड़ी का अलग है क्रेज
पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल सहित दूसरे साउथ एशियन देशों में भी साड़ी महिलाओं के लिए पारंपरिक है। भारत में साड़ियों की अनुमानित 30 से अधिक रीजनल किस्मे है। बनारस की साड़ी तो देश के साथ ही विदेशों में भी महिलाओं के लिए आकर्षण होती है। चमकीले कलर, सोने, चांदी और ताबें के धागों से इसमें डिजाइन बनाया जाता है। ये दुल्हनों के लिए स्पेशली तैयार की जाती है।

क्रायोला-बॉक्स ब्राइट्स साड़ियों का चलन
टॉपिकल केरल में, मुख्य रूप से सफेद मुंडू साड़ियां 19वीं की लोकप्रिय शैलियों को दिखाती है। आज सबकॉन्टिंनेंट के चारों ओर कलरफुल एनिलिन डाई और क्रायोला-बॉक्स ब्राइट्स साड़ियों का चलन है।
भारत में कपड़ो का विकास साड़ियों के डिजाइनों में दिखाता है। बढ़ते विदेशी प्रभाव के साथ, साड़ी पहला भारतीय अंतर्राष्ट्रीय परिधान बन चुकी है। photo-Instagram



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