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पाकिस्तान के 3 हजार गोले भी नहीं हिला पाए थे Tanot Mata मंदिर का एक ईंट, ब्रिगेडियर ने माथा टेक मांगी थी माफी
Tanot Mata Temple Story : कश्मीर के पहलगाम में हाल ही में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर तनाव का माहौल है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब दोनों देशों के रिश्ते युद्ध जैसे हालात तक पहुंचे हों। आज़ादी के बाद से अब तक भारत और पाकिस्तान तीन बार आमने-सामने युद्ध लड़ चुके हैं-1947, 1965 और 1971 में। इन जंगों की गवाही इतिहास के पन्ने ही नहीं, बल्कि कुछ खास स्थल भी देते हैं। ऐसा ही एक स्थल है राजस्थान के जैसलमेर जिले का तनोट माता मंदिर, जिसे आज भी अद्भुत चमत्कारों के लिए जाना जाता है।
तनोट गांव भारत-पाकिस्तान सीमा से महज 20 किलोमीटर दूर है और यह देश के आखिरी गांवों में से एक माना जाता है। यहां स्थित मातेश्वरी तनोट राय का मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि वीरता, आस्था और चमत्कार का प्रतीक बन चुका है। यह मंदिर सीमा सुरक्षा बल (BSF) की निगरानी में है और इसके सारे प्रबंधन की जिम्मेदारी भी बीएसएफ के पास है। यहां तैनात जवान इस मंदिर को 'सीमा माता' मानते हैं। हर युद्ध, ऑपरेशन या मिशन से पहले वे मंदिर में मत्था टेककर आशीर्वाद लेते हैं।

जब बम बरसे, मगर मंदिर अडिग रहा
1965 के भारत-पाक युद्ध में तनोट क्षेत्र में पाकिस्तानी सेना ने भारी बमबारी की। लेकिन चमत्कार यह था कि करीब 3000 बम मंदिर और उसके आस-पास गिराए गए, लेकिन एक भी बम फटा नहीं। इनमें से लगभग 450 बम मंदिर परिसर के भीतर गिरे थे। यह चमत्कार सैनिकों की आस्था को और दृढ़ कर गया। यही नहीं, 1971 की जंग में भी जब पाकिस्तान ने दोबारा तनोट को निशाना बनाया, तब भी मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुंचा।
इन बमों को आज भी मंदिर परिसर में बने एक संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है, जो इन चमत्कारों की गवाही देते हैं। यह स्थान आज न केवल धार्मिक श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि भारतीय वीरता और आध्यात्मिकता का भी प्रतीक है।
पाकिस्तानी ब्रिगेडियर भी हुए थे नतमस्तक
1965 की लड़ाई के दौरान तनोट माता के चमत्कारों से केवल भारतीय ही नहीं, बल्कि पाकिस्तानी अफसर भी प्रभावित हुए। पाकिस्तानी ब्रिगेडियर शाहनवाज खान ने भारत सरकार से मंदिर के दर्शन की अनुमति मांगी। करीब ढाई साल की प्रतीक्षा के बाद जब उन्हें इजाज़त मिली, तो उन्होंने मंदिर में चांदी का छत्र चढ़ाया। यह छत्र आज भी मंदिर में रखा हुआ है और उस घटना का गवाह बना हुआ है।
बीएसएफ के जवानों की सेवा और श्रद्धा
यह देश का ऐसा पहला मंदिर है, जिसका संचालन पूरी तरह BSF के जिम्मे है। मंदिर की सफाई, व्यवस्था और तीनों समय की आरती बीएसएफ के जवान ही करते हैं। यहां की आरती में भक्ति के साथ सैनिक अनुशासन और जोश का अनोखा संगम देखने को मिलता है। वर्तमान में यहां बीएसएफ की 139वीं वाहिनी तैनात है।
रुमाल बांध मांगते हैं मन्नतें
तनोट माता को 'रुमाल वाली देवी' भी कहा जाता है। मान्यता है कि जो भक्त मंदिर में रुमाल बांधकर मन्नत मांगता है, उसकी इच्छा जरूर पूरी होती है। मन्नत पूरी होने पर वह रुमाल खोलकर आभार प्रकट करता है। यही वजह है कि हर साल दूर-दराज से हजारों श्रद्धालु पैदल यात्रा कर तनोट माता के दर्शन को पहुंचते हैं।
फिल्म 'बॉर्डर' में भी दिखाया गया है यह दृश्य
1997 में आई सुपरहिट फिल्म 'बॉर्डर' में भी तनोट माता के चमत्कार को दिखाया गया है। फिल्म में पाकिस्तानी सेना द्वारा मंदिर पर बमबारी करने का दृश्य है, लेकिन मंदिर को खरोंच तक नहीं आती। यह दृश्य न केवल दर्शकों को रोमांचित करता है, बल्कि उस सच्चाई की याद दिलाता है, जिसे आज भी सैकड़ों सैनिक और स्थानीय लोग आंखों देखा सच मानते हैं।



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