Mini Israel के नाम से मशहूर है भारत का ये गांव, विदेशी दामाद बन कईयों ने यहीं बसा ल‍िए घर

Mini Israel : एक ओर जहां ईरान और इजरायल के बीच जंग शुरू हो चुकी वहीं भारत के हिमाचल प्रदेश की वादियों में एक ऐसा गांव भी है जिसे लोग 'मिनी इजरायल' के नाम से जानते हैं।

कुल्लू जिले की मणिकर्ण घाटी में स्थित कसोल गांव और कांगडा ज‍िले का धर्मकोट इजरायली पर्यटकों का ऐसा पसंदीदा ठिकाना बन चुका है, जहां हर गली, होटल और ढाबे में इजरायल की झलक दिखाई देती है।

Mini Israel

1990 में पहली बार इजरायली नागरिक पहुंचे यहां

कसोल, पार्वती नदी के किनारे बसा एक छोटा-सा गांव है। वर्ष 1990 में पहली बार इजरायली नागरिक यहां पहुंचे। शुरू में यह बस एक शांत हिल स्टेशन था, लेकिन इजरायलियों की लगातार बढ़ती संख्या के चलते इस जगह का रंग-रूप ही बदल गया। अब यहां की संस्कृति, खानपान, दुकानों और होटलों पर इजरायली कल्‍चर साफतौर पर देखने को म‍िलता है।

'पहाड़ों का तेल अवीव'

धर्मकोट को 'पहाड़ों का तेल अवीव' कहा जाता है, जो कांगड़ा जिले में स्थित है, जबकि कसोल कुल्लू जिले में है। कसोल में करीब 15 साल पहले 'खबाद हाउस' बनाया गया था। यहां लगभग 1500 इजरायली नागरिक स्थायी रूप से रह रहे हैं। उन्होंने इस शांत और सुंदर जगह को अपना घर बना लिया है और स्थानीय संस्कृति में घुल-मिल गए हैं।

क्यों पसंद है इजरायलियों को कसोल?

इजरायल में सैन्य सेवा अनिवार्य होती है। सेना से सेवा पूरी करने के बाद युवा कुछ महीनों के लिए शांति और सुकून की तलाश में निकलते हैं। ऐसे में भारत के हिमाचल की वादियां, खासकर कसोल, उनके लिए पसंदीदा जगह बन गई। शांत वातावरण, सस्ती जीवनशैली और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा यह क्षेत्र उन्हें बेहद भाता है।

त्योहार भी मनाते हैं कसोल में

अक्टूबर में इजरायली पर्यटक 'रोष हाशना', 'योम कीपर' और 'सिमचट तोराह' जैसे यहूदी त्योहार यहीं मनाते हैं। हजारों की संख्या में वे पार्वती घाटी, कालगा और पुलगा पहुंचते हैं। यहां यहूदी पूजा स्थलों के लिए इजरायल सरकार ने कसोल में 'खबाद हाउस' भी बनवाया है, जहां रब्बी (पुजारी) की नियुक्ति भी की गई है।

स्थानीय लोग भी हो गए हैं इजरायली रंग में रंगे

कसोल की सड़कों पर हिब्रू भाषा में साइनबोर्ड, पोस्टर और मेन्यू कार्ड देखना आम बात है। होटल और ढाबों के संचालक भी अब हिब्रू में संवाद कर लेते हैं। यहां इजरायली व्यंजन जैसे फालाफेल, हुमस और शाक्षुका भी आसानी से मिलते हैं। इंटरनेट कैफे में भी मुख्य भाषा हिब्रू हो चुकी है।

मिनी इजरायल सिर्फ नाम नहीं, एक संस्कृति बन गई

आज कसोल में हजारों इजरायली पर्यटक हर साल आते हैं और कई तो यहां 6 महीने से ज्यादा वक्त बिताते हैं। स्थानीय लोगों के लिए यह व्यवसाय का बड़ा स्रोत बन गया है। इजरायली लोग आमतौर पर शांत, एकांतप्रिय स्थानों पर रहना पसंद करते हैं, जिससे कसोल की प्राकृतिक खूबसूरती भी सुरक्षित बनी रहती है।

कई कर चुके हैं यहां शादी

कसोल में इजरायली पर्यटक अब सिर्फ सैलानी नहीं रह गए हैं, बल्कि यहां की जिंदगी में पूरी तरह घुल-मिल चुके हैं। कई इजरायली नागरिकों ने यहां की स्थानीय युवतियों से विवाह भी कर लिया है। वे अब इस क्षेत्र का हिस्सा बन चुके हैं और उनका रहन-सहन, बोलचाल और जीवनशैली भी काफी हद तक स्थानीय रंग में रंग गया है। कसोल की गलियों में जब वे नजर आते हैं, तो यह एहसास नहीं होता कि वे विदेशी हैं। वे इतने सहज और अपनापन लिए हुए दिखते हैं कि ऐसा लगता है मानो वे हमेशा से यहीं के निवासी हों।

तोश और मणिकरण भी बने इजरायली टूर‍िस्‍ट की पसंद

कसोल के पास स्थित तोश, मणिकरण, और मलाणा जैसे गांव भी इस संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं। इन जगहों पर भी इजरायली पर्यटकों की खास मौजूदगी रहती है। मणिकरण, जहां एक ओर सिखों और हिंदुओं के लिए पवित्र धार्मिक स्थल है, वहीं दूसरी ओर यह भी इजरायली यात्रियों के बीच खासा लोकप्रिय है।

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