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क्या था 40 साल पुराना शाहबानो केस? जिस पर बनी है यामी गौतम-इमरान हाशमी की आने वाली फिल्म ‘हक’
Who is Shah Bano case : फिल्म 'हक' का टीजर 1985 के ऐतिहासिक मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम फैसले को एक बार फिर चर्चा में ले आया है। इसमें यामी गौतम शाह बानो से प्रेरित काल्पनिक किरदार शाजिया बानो और इमरान हाशमी उनके पति की भूमिका निभा रहे हैं। जिग्ना वोरा की किताब 'बानो: भारत की बेटी' पर आधारित यह फिल्म 1970-80 के दशक की पृष्ठभूमि में बनी है।
यह न सिर्फ शाह बानो केस बल्कि उससे जुड़े सामाजिक और कानूनी सवालों को भी सामने लाती है। फिल्म यह विमर्श छेड़ती है कि न्याय सबके लिए समान क्यों नहीं, धर्म और कानून की सीमा रेखा कहां है, और क्या भारत में समान नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए।

कौन थीं शाहबानो?
शाहबानो बेगम मध्य प्रदेश के इंदौर की एक मुस्लिम महिला थीं। 62 वर्ष की उम्र में, 1978 में उनके पति मोहम्मद अहमद खान जो खुद एक वकील थे, उन्होंने उन्हें तलाक दे दिया। 43 साल की शादी और पांच बच्चों के बाद अचानक मिली इस तलाक ने शाहबानो को बेसहारा कर दिया। न तो उनके पास खुद का कोई साधन था, और न ही पति ने गुजारा भत्ता देने की जिम्मेदारी स्वीकार की।
मजबूर होकर शाहबानो ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग की। यह धारा धर्म से परे हर नागरिक पर लागू होती है और यह कहती है कि कोई भी व्यक्ति अपनी पत्नी, बच्चों या माता-पिता को बेसहारा नहीं छोड़ सकता।
1985 का ऐतिहासिक फैसला
मोहम्मद अहमद खान ने दलील दी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पति सिर्फ इद्दत की अवधि (लगभग तीन महीने 13 दिन) तक ही भरण-पोषण देने के लिए बाध्य है। निचली अदालतों ने शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसे खान ने चुनौती दी और मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा।
23 अप्रैल 1985 को सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। पांच न्यायाधीशों की पीठ, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस वाई.वी. चंद्रचूड़ कर रहे थे, ने कहा कि धारा 125 सभी नागरिकों पर लागू होती है और पति तलाक के बाद भी पत्नी के भरण-पोषण का जिम्मेदार है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अब समय आ गया है जब भारत में समान नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए। यह फैसला महिलाओं के अधिकारों के लिए बड़ी जीत माना गया, लेकिन साथ ही इसने धर्म और कानून के बीच गहरी बहस को भी जन्म दिया।
राजनीतिक दबाव और 1986 का कानून
फैसले के बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कई धार्मिक संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया। उनका कहना था कि सरकार शरीयत में हस्तक्षेप कर रही है। बढ़ते दबाव के चलते तत्कालीन सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार का संरक्षण) अधिनियम पारित कर दिया।
इस कानून के अनुसार, तलाकशुदा मुस्लिम महिला को सिर्फ इद्दत की अवधि तक ही गुजारा भत्ता मिलेगा। इसके बाद उसकी जिम्मेदारी उसके रिश्तेदारों या वक्फ बोर्ड की होगी। यह कानून सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने वाला था और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसकी कड़ी आलोचना की। शाहबानो केस आज भी भारतीय राजनीति और कानून में समान नागरिक संहिता पर होने वाली हर बहस का अहम हिस्सा है। यह मामला यह दिखाता है कि एक अकेली महिला की हिम्मत किस तरह पूरे देश के कानून और राजनीति में बहस छेड़ सकती है।
अब बड़े पर्दे पर शाहबानो की कहानी
शाहबानो की प्रेरणादायक गाथा अब बड़े पर्दे पर नजर आने वाली है। फिल्म का नाम है 'हक', जिसका टीजर हाल ही में रिलीज हुआ है। इस फिल्म में यामी गौतम शाजिया बानो का किरदार निभा रही हैं, जो शाहबानो केस से प्रेरित है। वहीं इमरान हाशमी उनके पति के किरदार में दिखेंगे।
'हक' 1970 के दशक के आखिर और 1980 के शुरुआती दौर की पृष्ठभूमि पर आधारित है और यह जिग्ना वोरा की किताब "बानो: भारत की बेटी" से प्रेरित है। हालांकि फिल्म को नाटकीय और काल्पनिक रूप दिया गया है। यह फिल्म 7 नवंबर 2025 को सिनेमाघरों में रिलीज होगी।



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