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Abortion Case: प्रेग्नेंसी के 20 हफ्ते के बाद अबॉर्शन कराना हो सकता है डेंजरर्स, जानें जोखिम और खतरें?
26 Weeks Pregnancy Abortion Case : इन दिनों गर्भपात से जुड़ा एक मामला बहुत चर्चा का विषय बना हुआ है। जहां सुप्रीम कोर्ट ने 26 हफ्ते की गर्भवती महिला के भ्रूण के टर्मिनेशन से मना कर दिया। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने महिला की प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन की इजाजत देने से इनकार करते हुए कहा कि महिला का भ्रूण पूरी तरह से स्वस्थ है और AIIMS की रिपोर्ट के मुताबिक, कोख में पल रहा भ्रूण पूरी तरह स्वस्थ है।
ऐसे में केवल परिवार के चाहने से बच्चे की धड़कन बंद कर देना सही नहीं है। दरअसल एम्स मेडिकल बोर्ड का तर्क है कि देर से गर्भपात, विशेष रूप से 24 सप्ताह से अधिक गर्भ को गिराने का मतलब है, मां और बच्चें के सेहत के साथ महत्वपूर्ण जोखिम उठाना।
आइए इस बारे में और जानते हैं कि प्रेग्नेंसी के एडवांस स्टेज यानी 20 हफ्तें में आकर गर्भपात कराना कैसे जोखिम भरा हो सकता है?

क्या होता है लेट अबॉर्शन ?
अक्सर गर्भावस्था के 20वें सप्ताह के बाद करवाए जाने वाले गर्भपात को लेट अबॉर्शन माना जाता है। इस समय तक गर्भावस्था एडवांस स्टेज यानी काफी आगे बढ़ चुक होती है और गर्भ में भ्रूण का विकास तेजी से होना शुरु हो जाता है। लेट अबॉर्शन यानी एडवांस स्टेज पर आकर गर्भपात करवाना प्रारम्भिक गर्भावस्था (12 हफ्ते से पहले) और दूसरी तिमाही की शुरुआत (20 वां हफ्ता शुरु होने से पहले) से अलग होता है। एडवांस स्टेज पर गर्भपात करवाने में अधिक जटिल चिकित्सा प्रक्रिया शामिल होती है और मेडिकल और भावनात्मक रिस्क की भी संभावना बढ़ जाती हैं।
20 हफ्ते के बाद गर्भपात के नुकसान?
- प्रेग्नेंसी के एडवांस स्टेज में आकर गर्भपात करवाना, विशेष रूप से 24वें सप्ताह के बाद शारीरिक जटिलताओं का कारण बन सकता हैं। इन जोखिमों में रक्तस्राव, संक्रमण, गर्भाशय पर चोट और अन्य अंगों को नुकसान जैसे रिस्क भी शामिल हैं।
- इन प्रक्रियाओं में अक्सर सर्जरी की आवश्यकता होती है, जिससे पोस्ट-ऑपरेटिव रिस्क की संभावना बढ़ जाती है।
- इन सबके के अलावा, महिला के लिए भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक रुप से खुद को कमजोर महसूस करती हैं और इनसे उबरने में उन्हें काफी लंबा समय लग जाता है।
कैसे लेट अबॉर्शन महिला को करता है प्रभावित?
एडवांस स्टेज में आकर गर्भपात महिला के शरीर पर महिला के शरीर पर अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों प्रभाव छोड़ सकता हैं। शारीरिक रूप से, कुछ मामलों में इसके परिणामस्वरूप घाव, गर्भाशय क्षति या प्रजनन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। भावनात्मक रूप से, यह अपराधबोध, दुःख और चिंता की भावनाओं को जन्म दे सकता है।

लेट अबॉर्शन आपको नुकसान पहुंचा सकता है?
देर से गर्भपात जोखिम भरा होता है क्योंकि भ्रूण अधिक विकसित होता है, जिससे प्रक्रिया अधिक जटिल हो जाती है। सर्जरी की आक्रामक प्रकृति के कारण माँ के स्वास्थ्य से समझौता हो सकता है। कानूनी प्रतिबंध अक्सर देर से होने वाले गर्भपात को उन स्थितियों तक सीमित कर देते हैं जहां गंभीर भ्रूण असामान्यताएं या जीवन-घातक परिस्थितियां होती हैं। नैतिक और चिकित्सीय जटिलताओं के कारण 24 सप्ताह के बाद के गर्भपात पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
यह भी जान लें
20 वें हफ्तों के बाद गर्भपात बेहद जटिल प्रक्रियाहै, जिससे महिलाएं शारीरिक और भावनात्मक रुप से प्रभावित होती है, इसलिए यह जरूरी है कि महिलाएं इन प्रक्रियाओं के जोखिमों और निहितार्थों को समझें। गर्भपात के बाद महिलाएं इमोशनल रुप से काफी ज्यादा टूट जाती है। खासतौर पर स्ट्रेस काफी ज्यादा बढ़ जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 (MTP ACT) के नियमों को बरकरार रखता है। जिसमें गर्भ को गिराने की अनुमति 0 से 20 हफ्ते तक उन महिलाओं को है जो मां बनने के लिए मानसिक तौर पर तैयार नहीं है। या फिर महिला ना चाहते हुए भी प्रेग्नेंट हो गई है। हालांकि, ऐसे मामलों में रजिस्टर्ड डॉक्टर की लिखित अनुमति आवश्यक होती है।
20 से 24 हफ्ते तक के गर्भ गिराने की अनुमति उन मामलों में दी जाती है जिसमें मां या बच्चे के मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य को किसी तरह के खतरा का अनुमान होता है। वहीं इस तरह के मामले में दो डॉक्टरों की लिखित अनुमति आवश्यक होती है।
अस्वीकरण: इस लेख का उद्देश्य देर से होने वाले गर्भपात और महिलाओं के स्वास्थ्य पर इसके प्रभावों के विषय पर जानकारी प्रदान करना है। यह पेशेवर चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। विशेषज्ञ मार्गदर्शन के लिए किसी स्वास्थ्य सेवा प्रदाता से परामर्श लें।



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