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कर्ण-वेध संस्कार: बच्चों के कान कब और क्यों छिदवाने चाहिए, कान बिंदते वक्त इंफेक्शन न हो रखें ये सावधानी
What is the Right time to Pierce Baby's Ears : हिन्दू धर्म में 16 संस्कारों में से एक कर्ण वेध संस्कार का उल्लेख मिलता है। इस कड़ी में ये नौवां संस्कार है कर्णवेध संस्कार। जैसा कि हिंदू धर्म के हर संस्कार के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण होता है। इस संस्कार के पीछे माना जाता है कि बच्चे की सुनने की क्षमता का विकास होती और उसकी इम्यूनिटी स्ट्रॉन्ग होती है।
कर्णवेध संस्कार के तहत कान में जो आभूषण धारण कराए जाते हैं, उससे बच्चे की सुदंरता भी बढ़ती है। इसके तहत लड़के के दाएं और लड़की के बाएं कान को पहले छेदने की परंपरा है। आइए जानते हैं कि कर्ण वेध संस्कार के पीछे क्या कारण है और कान छिदवाते वक्त किन बातों का रखें ध्यान।

कब करना चाहिए कर्णवेध संस्कार-
इस संस्कार के बारे में कहा जाता है कि यह बालक के जन्म से दसवें, बारहवें, सोलहवें दिन या छठे, सातवें आठवें महीने में किया जा सकता है। बालक शिशु का पहले दाहिना कान फिर बायां कान और कन्या का पहले बायां कान फिर दायां कान छेदना चाहिए। कान छिदवाने के कई कारण होते हैं। इस संस्कार के अनुसार दो लाभ होते हैं पहले यह कि राहु और केतु संबंधी प्रभाव समाप्त होता है और दूसरा यह कि संतान स्वस्थ रहे, उन्हें रोग और व्याधि परेशान न करें।
कान छिदवाने के फायदे-
- कान छिदवाने से सुनने की क्षमता बढ़ जाती है।
- कान छिदवाने से आंखों की रोशनी तेज होती है।
- कान छिदने से तनाव भी कम होता है।
- कान छिदने से लकवा जैसी गंभीर बीमारी होने का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।
- इससे बुरी शक्तियों का प्रभाव दूर होता है और व्यक्ति दीर्घायु होता है।
- इससे मस्तिष्क में रक्त का संचार समुचित प्रकार से होता है। इससे दिमाग तेज चलता है।
- कान के निचले हिस्से पर दबाव पड़ने से तनाव कम होता है। साथ ही दिमाग की अन्य परेशानियों से भी बचाव होता है।
- पुरुषों के द्वारा कान छिदवाने से उनमें होने वाली हर्निया की बीमारी खत्म हो जाती है।
- पुरुषों के अंडकोष और वीर्य के संरक्षण में भी कर्णभेद का लाभ मिलता है।
- मान्यता अनुसार कान छिदवाने से व्यक्ति के रूप में निखार आता है।
- कान छिदवाने से मेधा शक्ति बेहतर होती है तभी तो पुराने समय में गुरुकुल जाने से पहले कान छिदवाने की परंपरा थी।
- लाल किताब अनुसार कान छिदवाने से राहु और केतु के बुरे प्रभाव का असर खत्म होता है। जीवन में आने वाले आकस्मिक संकटों का कारण राहु और केतु ही होते हैं अत: कान छिदवाना जरूरी है।

कौनसी उम्र में कान छिदवाना सही रहता है?
अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार बच्चों के कान बिंदवाने की कोई उम्र नहीं है। अगर सही तरह से और साफ-सफाई का ध्यान रखकर ईयर पियर्सिंग की जाए तो इससे कोई खतरा नहीं होता है।
कुछ पेरेंट्स बच्चे के जन्म के 12 दिन बाद ही पियर्सिंग करवा देते हैं तो कुछ एक साल के होने के बाद करवाते हैं। कुछ मेडिकल संस्थानों के अनुसार बच्चों की पियर्सिंग तब करवानी चाहिए जब वो अपने कान की देखभाल खुद कर सकें। लेकिन इसके लिए हर बच्चे की उम्र अलग हो सकती है क्योंकि कुछ बच्चे पहले जिम्मेदार और समझदार हो जाते हैं तो कुछ इसमें समय लगता है।
कान छिदवाते वक्त इन बातों का रखें ध्यान
बच्चे बहुत ही सेंसेटिव होते हैं। पहली बार कान छिदवाते वक्त बहुत सारी बातों का ध्यान रखना चाहिए। किसी अनुभवी व्यक्ति द्वारा ही बच्चे के कान छिदवाने चाहिए। कान छेदने वाली सुईं अगर गंदी हो या उस पर जंग लगा हो, तब उससे हेपटाइटिस बी, हेपटाइटिस सी, निकेल एलर्जी, टिटनेस और एचआईवी (HIV) जैसी संक्रमण और बीमारियों के होने का खतरा बन रहता है।



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