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एचआईवी संक्रमित बच्चों में दवा कितनी कारगर?
एक नए शोध से संकेत मिले हैं कि एचआईवी संक्रमित आठ में से एक बच्चा दवा लेने के पाँच साल के अंदर एंटीरेट्रोवायरल दवाइयों के प्रति अपनी प्रतिरक्षा क्षमता (इम्यूनिटी) खो देता है. जबकि बड़े लोगों में ऐसा काफ़ी देर बाद होता है.
इसका मुख्य कारण दवाइयों का ख़राब स्वाद बताया गया है जिस वजह से बच्चे इन्हें नियमित रूप से नहीं लेते. नए शोध से इस बात पर सवाल उठ रहे हैं कि एचआईवी बच्चों के लिए उपलब्ध दवाईयाँ कितनी उपयुक्त हैं. पहली बार हुई इस शोध में यूके मेडिकल रिसर्च काउंसिल के डॉक्टरों ने आठ यूरोपीय देशों के बच्चों का अध्ययन किया है.
शोधकर्ताओं का कहना है कि दवा बनाने वालों और क्लिनिक में प्रयोग करने वालों को ऐसी दवाएँ विकसित करनी होंगी जो लेने में आसान हों, मात्रा कम हो और जिनका स्वाद इतना ख़राब न हो.
कितनी उपयुक्त?
एचआईवी संक्रमण के लिए मुख्यत एंटीरेट्रोवायरल ड्रग्स दी जाती हैं. इन दवाईयों की वजह से शरीर में एचआईवी का स्तर कम रहता है जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली कमज़ोर नहीं होती. यानी मरीज़ को एचआईवी के कारण हो चुके नुकसान से उबरने में मदद मिलती है.
लेकिन अगर ये दवा रोज़ न ली जाए तो एचआईवी वायरस पर दवाइयों का असर होना बंद हो जाता है. ये दवाएँ तो ताउम्र दिन में कई बार लेनी पड़ती हैं. शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चे और किशोर रोज़ दवा नहीं ले पाते. प्रोफ़ेसर करिना बटलर कहती हैं, “युवा लोग नियमित रूप से दवा नहीं लेते. बच्चों को भी दवा देना मुश्किल होता है. दवा का टेस्ट बहुत ख़राब और कड़वा होता है, पेट्रोल जैसा."
वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर दवाओं में सुधार होता है तो दुनिया भर में एचआईवी से संक्रमित 20 लाख बच्चों के बेहतर इलाज में मदद मिलेगी.



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