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गर्भावस्था के दौरान शिशु में मधुमेह के प्रभाव
हम महिला गर्भवती होती है, तब उसके शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव देखने को मिलते हैं। उदाहरण के तौर पर महिला का ब्लड शुगर लेवल हाई होता है। कभी-कभी तो उनका शरीर जरुरतभर का इंसुलिन भी पैदा नहीं करता। इससे उन्हें मधुमेह या गर्भावधि मधुमेह होने के चांस बढ़ जाते हैं। महिला तब मधुमेह हो सकता है, जब कि उसके खानदान में मधुमेह का कोई पूर्व इतिहास न रहा हो। इससे मां और पेट में पल रहे शिशु की जान को काफी खतरा होता है। आइये जानते हैं कि गर्भवस्था के दौरान शिशु पर मधुमेंह का क्या प्रभाव पड़ता है।

गर्भावस्था के दौरान शिशु में मधुमेह के प्रभाव
स्वास्थ्य को खतराः प्रेगनेंसी के जल्द के हफ्तो में मधुमेह शिशु पर बुरी तरह से प्रभाव डाल सकता है। यह शिशु के अंदर के अंगों को प्रभावित कर सकता है। शिशुओं में मधुमेह के लक्षणों को कैसे पहचानें
शिशु का वजन बढनाः मधुमेह होने से गर्भ में पल रहे शिशु का वजन बढ सकता है। यह वजन हफ़ते भर में इतना ज्यादा बढ़ सकता है कि मां को प्रसव के समय परेशानी पैदा हो सकती है। प्राकृतिक प्रसव बच्चे और मां दोनों के लिये खतरनाक साबित हो सकता है।
समय से पहले जन्मः प्रेगनेंसी के समय मां को अगर मधुमेह हो तो, गर्भ में बच्चे के जल्दी बढ़ने की वजह से बच्चा अपनी अवधि पूरी नहीं कर पाता। फिर शिशु को ऐसे में गर्भ काल पूरा होने से पहले ही निकाल लिया जाता है।
सिजेरियन डिलवरीः मां के लिये प्राकृतिक प्रसव करवाना मुश्किल होता है और इससे मां को भी काफी मुश्किलों का सामना करना पडता है। अगर शिशु की बात करें तो हो सकता है कि प्रसव करवाते समय उसका सिर तो बाहर आ जाए मगर उसके कंधे मां के लिये गर्भ में अटक जाएं।
जन्म के समय लो ब्लड शुगर होनाः कई सीरियस केसों में शिशु के शरीर में कई जरुरी खनिजों जैसे, कैल्शियम और मैगनीशियम की कमी होने के कारण उन्हें पीलिया हो जाता है। जन्म के बाद अगर शिशु की सही देखभाल की जाए तो उन्हे यह समस्या नहीं आती। शिशु को डॉक्टर दृारा खनिज की खुराख देने की सलाद भी दी जाती है।



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