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700 श्लोक वाला हिंदू धर्मग्रंथ भगवद गीता भारतीय महाकाव्य महाभारत का हिस्सा है। ये एक ऐसा पवित्र ग्रंथ है जो जीवन के विभिन्न पहलुओं पर सही और सकारात्मक राह प्रदान करता है। रिश्तों के मामले में भी ये भटके हुए राही को सही मार्गदर्शन प्रदान करता है। चाहे मामला पर्सनल हो या प्रोफेशनल भगवद गीता व्यक्ति को खुद को गहरे स्तर पर समझने के लिए प्रोत्साहित करती है।
यह सिखाती है कि सच्चा ज्ञान सेल्फ-एनॉलिसिस से शुरू होता है। इससे पहले कि हम दूसरों के साथ हेल्दी रिलेशन बना सकें, हमें पहले अपनी इच्छाओं, भय, शक्तियों और कमजोरियों को समझना होगा।

सेल्फ एनॉलिसिस और सेल्फ-अवेयरनेस के जरिए, हम अपने रिश्तों को स्पष्टता और प्यार के साथ बेहतर ढंग से निभाने में सक्षम हो सकते हैं। यहां हम आपको भगवद गीता से हेल्दी रिलेशन बनाए रखने के तरीके बताने जा रहे है।
धर्म और कर्तव्य
गीता व्यक्ति के कर्तव्य को पूरा करने के महत्व पर जोर देती है। रिश्तों के संदर्भ में, इसका मतलब विभिन्न भूमिकाओं में हमारी जिम्मेदारियों को समझना और पूरा करना है - चाहे वह एक साथी, माता-पिता, दोस्त या परिवार के सदस्य के रूप में हो। जब व्यक्ति अपने धर्म के अनुसार कार्य करते हैं, तो वे अपने रिश्तों में सकारात्मक योगदान देते हैं और एक सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाते हैं।
प्यार से सबको जीता जा सकता है
गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि मैं भी प्रेम से ही शुद्ध रूप से प्राप्त किया जा सकता हूं। प्रेम सभी दरवाजे खोल देता है। हम नफरत, क्रोध, प्रतिशोध और ऐसी ही अन्य भावनाओं से दुश्मन बनाते हैं। लोगों को यह समझना होगा कि हम प्यार फैलाकर और पॉजिटिविटी के साथ सभी लोगों को अपने पक्ष में किया जा सकता हैं।
पहले खुद से प्यार करें
आंतरिक शांति केवल आत्म-जागरूकता से ही प्राप्त की जा सकती है, एक बार जब आप वास्तव में खुद को समझ लेंगे तो आपके अस्तित्व में केवल सौम्य प्रेम की भावना होगी। यह प्रेम का सबसे शुद्ध रूप है। एक बार जब आपके मन में अपने प्रति इस प्रकार का प्रेम आ जाएगा तो आप निश्चित रूप से अन्य लोगों से भी वैसा ही प्यार करेंगे। इस प्रकार का प्रेम मुक्तिदायक है, यह व्यक्ति को भौतिकवादी और भावनात्मक जरूरतों से मुक्ति दिलाने में मदद करता है।
अहंकार नहीं विनम्रता से पेश आए
महाभारत में, भगवान कृष्ण कहते हैं, "जो कुछ भी तुम्हें करना है वह करो, लेकिन लालच से नहीं, अहंकार से नहीं, वासना से नहीं, ईर्ष्या से नहीं बल्कि प्रेम, करुणा, विनम्रता और भक्ति के साथ"। लालच, अहंकार, वासना और ईर्ष्या एक श्रेष्ठ गुणवत्ता वाले नकारात्मक भाव हैं, ये लोगों में निराशा पैदा करते हैं। जब हम ऐसी भावनाओं से कार्य करते हैं, तो हम कभी सफल नहीं होंगे, हम कभी बेहतर रिश्ते नहीं बना पाएंगे और केवल नाराजगी भरा जीवन जिएंगे। प्रेम संबंध में अगर ये भावनाएं बरकरार रहें तो ये एक जोड़े को बर्बाद कर सकती हैं।
उदार बनो
गीता हमें दूसरों को अपने समान देखना सिखाती है। प्यार में जब हम दूसरों को अपने जैसा देखते हैं तो हम उनके साथ दुर्व्यवहार नहीं करेंगे। सबसे आसान प्रेम संबंध बनाने के लिए खुद से पहले दूसरे व्यक्ति को पहले रखें, फिर देखें कि आपका जीवन कितना सुंदर हो जाता है।
उम्मीदों के बिना प्यार
"प्यार का मतलब ये हरगिज नहीं है कि हम सामने वाले को अपनी प्यार की जंजीरों में बांध दें। बल्कि हमारे प्यार में पड़े दूसरे व्यक्ति को आज़ाद कर देना चाहिए"। हमें यह समझना होगा कि सभी मनुष्यों में गलतियां करने की क्षमता होती है। मनुष्य न तो पूरी तरह से अच्छा होता है और न ही पूरी तरह से बुरा। उसमें मिश्रित गुणों का समावेश होता हैं। लोगों को उनकी बुरी आदतें समझानी होंगी, न कि उनसे यह अपेक्षा करनी होगी कि वे सब कुछ खुद से ही समझ जाए।



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