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रिश्तों से जुड़ी समस्याओं का हल छिपा है संस्कृत के इन श्लोकों में, हर समस्या का मिल जाएगा हल
कहते है जब स्त्री और पुरुष शादी के बंधन में बंधते हैं, तो उन्हें इस रिश्ते से कई सारी उम्मीदें होती हैं। शादी लव हो या अरेंज, शुरुआत में हर किसी को यह समझने में थोड़ा वक्त लग जाता है कि यह बंधन कैसा होना चाहिए। ज्यादातर लोग अपने रिश्ते को बचाने में असफल हो जाते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि उन्हें इसका समाधान कभी नहीं मिल पाता। कभी-कभी विश्वास और ज़िम्मेदारियों की कमी के कारण एक-दूसरे के बीच प्यार कम हो जाता है।
लेकिन आप किसी भी स्थिति में उम्मीद न खोएं क्योंकि एक मजबूत रिश्ता कभी नहीं टूट सकता अगर आप दोनों ने इसे बहुत प्यार से बनाया हो।

खैर, अगर आप भी कुछ समय से अपनी शादी से खुश नहीं है, या आपके और आपके साथी के आपसी बंधन की डोर कमजोर होती दिख रही है। तो यहां हम आपको कुछ ऐेसे श्लोक बताने वाले हैं जो आपके रिलेशन को बेहतर बना सकते हैं । ये मंत्र कपल्स को एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझने, एक-दूसरे की वेल्यू करने और आध्यात्मिक ज्ञान अपनाने में मदद करेगा।
श्लोक: केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः,
न स्नानं न विलोपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः।
वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता र्धायते,
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥
अर्थ- बाजुबंद पुरुष को शोभित नहीं करते और न ही चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हार, न स्नान, न चन्दन, न फूल और न सजे हुए केश ही शोभा बढ़ाते हैं। केवल सुसंस्कृत प्रकार से धारण की हुई एक वाणी ही उसकी सुन्दर प्रकार से शोभा बढ़ाती है। साधारण आभूषण नष्ट हो जाते हैं, वाणी ही सनातन आभूषण है।
श्लोक: द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति।
अर्थ- उपर्युक्त मन्त्र का सार यह है कि एक वृक्ष है, उस पर दो पक्षी बैठे हुए हैं, उनमें से एक वृक्ष के फलों का भोग कर रहा है, जबकि दूसरा भोग न करता हुआ प्रथम को देख रहा है। उक्त मन्त्र में वृक्ष प्रकृति का प्रतीक है, वृक्ष का आशय है कि जिसका छेदन होता हो अर्थात् जिसमें निरन्तर परिवर्तन होता रहे, जिसका रूप निरन्तर बदलता रहे, उस शक्ति का नाम वृक्ष है। जीव संसाररूपी वृक्ष का भोक्ता है, जबकि ईश्वर उस भोक्ता जीव का साक्षिमात्र है। जहाँ इस मन्त्र में जीव और ईश्वर की समानता प्रतिपादित की गयी है, वहीं उनकी परस्पर विलक्षणता को भी बताया गया है।
श्लोक: समं पश्यन्ति सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्।
अर्थ: जो पुरूष सबमें समभाव से स्थित परमेश्वर को समान भाव से देखता हुआ अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक: उग्रं विरामं महा-विष्णु मम ज्वलान्तुम सर्वथा,
मूघम नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्।।
अर्थ: हे क्रुद्ध एवं शूर-वीर महाविष्णु, आपकी ज्वाला एवं ताप चारों दिशाओं में फैली हुई है। हे नरसिंहदेव प्रभु, आपका चेहरा सर्वव्यापी है, तुम मृत्यु के भी यम हो और मैं आपके समक्ष आत्मसमर्पण करता हूं।
श्लोक: शिव शक्त्ययुक्तो यदिभावतिशक्तः प्रभविन्तुः, नचदेवेदेवोन खलुकुशलः स्पन्दितुमपि |
ओत्तावा मराध्यन्हहरिहर विरिच्छधिभिरापि प्रणन्तुस्तोतुव कथम्कृतिपुण्य प्रभावत्।।
अर्थ : पार्वती को शिव अर्धांगिनी कहा गया है क्योंकि उस शक्ति के बिना परमात्मा अशक्त है। उसके बिना शिव शव है जिसमें स्पन्दन भी नहीं हो सकता सृष्टि तो दूर की कौड़ी है।



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