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Zero Marriage : मद्रास हाई कोर्ट ने 20 वर्षीय महिला की शादी को किया कैंसिल, जानें क्या है जीरो मैरिज?
हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट में जीरो मैरिज को लेकर एक मामला सामने आया, जिसमें हाईकोर्ट ने 20 वर्षीय महिला के विवाह को रद्द कर दिया। इस मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने एक्सट्राऑर्डिनरी ज्यूरिस्डिक्शन (विशेष अधिकार) का उपयोग करते हुए 20 वर्षीय महिला की जबरन कराई गई शादी को रद्द कर दिया।
यह विवाह एक फ्रेंच शिक्षक के साथ किया गया था, और महिला का दावा था कि इस शादी में उसकी सहमति नहीं थी। उसने कोर्ट को बताया कि शादी और उसका रजिस्ट्रेशन जबरन कराए गए थे, और वह इसे मान्यता नहीं देती तथा उसके साथ रहना नहीं चाहती। यह मामला पुंडुचेरी का था।

महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए, कोर्ट ने इस बात को महत्व दिया कि विवाह में सहमति का अभाव एक वैध आधार है, जिसके कारण इसे शून्य घोषित किया जा सकता है। इसके बाद सवाल उठता है कि जीरो मैरिज क्या है और किन सिचुएशन में शादी शून्य हो जाती है और जीरो मैरिज तलाक से कितना अलग है?
जीरो मैरिज क्या है?
शादी शून्य होने का मतलब है कि कानून के अनुसार शादी का अस्तित्व ही नहीं माना जाता है। यह तब होता है जब शादी में कुछ गंभीर कानूनी खामियाँ पाई जाती हैं, जैसे कि किसी पक्ष का पहले से शादीशुदा होना, नाबालिग होना, या सहमति का अभाव। ऐसी स्थिति में शादी को वैध नहीं माना जाता और इसे कानूनी रूप से शून्य घोषित कर दिया जाता है।
शादी शून्य घोषित होने पर दोनों पक्षों के बीच पति-पत्नी का कोई अधिकार या कर्तव्य नहीं रह जाता, और इसमें गुजारा भत्ता या संपत्ति के दावों का कोई संबंध नहीं होता है।
शून्य शादी और तलाक दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएँ हैं जिनमें शादी समाप्त करने का तरीका और कारण भिन्न होते हैं:
डिवोर्स से कितनी अलग है जीरो मैरिज?
वैधता
शून्य शादी तब होती है जब शादी की शुरुआत से ही इसे अवैध माना जाता है। कानूनी दृष्टि से इस प्रकार की शादी कभी हुई ही नहीं मानी जाती, इसलिए इसे शून्य (null and void) करार दिया जाता है।
तलाक एक कानूनी प्रक्रिया है, जिसमें वैध रूप से हुई शादी को समाप्त किया जाता है। शादी का अस्तित्व रहा है, लेकिन अब पति-पत्नी आपसी सहमति या किसी कानूनी कारण से इसे खत्म कर रहे हैं।
वजह
शून्य शादी के लिए कानूनी कारण जैसे कि किसी पक्ष का पहले से शादीशुदा होना, नाबालिग होना, मानसिक असमर्थता, रक्त संबंध (जैसे भाई-बहन का रिश्ता), या धोखे से शादी करना हो सकते हैं।
तलाक में विवाह के बाद उत्पन्न समस्याएं जैसे घरेलू हिंसा, विश्वासघात, असहमति, मानसिक और शारीरिक दुर्व्यवहार, या आपसी मतभेद प्रमुख कारण होते हैं।
अधिकार और कर्तव्य
शून्य शादी में किसी पक्ष को गुजारा भत्ता, संपत्ति का अधिकार, या पति-पत्नी का दर्जा नहीं मिलता, क्योंकि कानूनी रूप से शादी को अस्तित्वहीन माना जाता है।
तलाक में पति-पत्नी के अधिकार जैसे कि गुजारा भत्ता, संपत्ति का विभाजन, बच्चों की कस्टडी, आदि का प्रावधान किया जाता है, क्योंकि यह एक वैध शादी का अंत है।
कानूनी प्रक्रिया
शून्य शादी को कोर्ट में शादी के अमान्य होने की घोषणा के माध्यम से समाप्त किया जाता है।
तलाक में कानूनी प्रक्रिया के तहत आपसी सहमति या विवाद के आधार पर कोर्ट से शादी को खत्म करने का आदेश लिया जाता है।
शादी किन सिचुएशन में शून्य हो सकती है?
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के सेक्शन 11 और 12 में शादी को शून्य घोषित करने के लिए कुछ विशेष परिस्थितियाँ होती हैं, जिनमें कानूनी तौर पर शादी का अस्तित्व नहीं माना जाता है।
पहले से शादीशुदा होना: यदि किसी पक्ष की पहले से ही कानूनी शादी हो और वह दूसरी शादी कर ले, तो यह शादी अवैध मानी जाती है और इसे शून्य घोषित किया जा सकता है।
निकट संबंध: अगर शादी दो ऐसे व्यक्तियों के बीच हो जो आपस में रक्त संबंधी रिश्ते में आते हैं (जैसे भाई-बहन, चाचा-भतीजी, आदि), तो इसे शून्य माना जाता है। भारतीय कानून में निकट रिश्तों में शादी अवैध होती है।
नाबालिग से शादी: यदि शादी के समय किसी पक्ष की उम्र कानून में तय की गई उम्र से कम है (लड़के के लिए 21 वर्ष और लड़की के लिए 18 वर्ष), तो यह शादी अवैध होती है और इसे शून्य किया जा सकता है।
मानसिक असमर्थता: अगर किसी पक्ष को मानसिक रूप से असमर्थ या मानसिक बीमारी से ग्रस्त माना जाता है और उसे शादी का अर्थ या जिम्मेदारियाँ समझने में अक्षम है, तो यह शादी भी शून्य हो सकती है।
अनुमति का अभाव: यदि शादी में सहमति धोखे, दबाव या डर से ली गई हो, तो इसे शून्य घोषित किया जा सकता है। सहमति की स्वतंत्रता और स्वीकृति विवाह के लिए आवश्यक है।
छल या धोखे से शादी: अगर शादी धोखे से की गई हो, जैसे कि किसी पक्ष ने अपनी पहचान, धर्म, या कोई महत्वपूर्ण तथ्य छुपाया हो, तो इसे शून्य करने की याचिका दी जा सकती है।
इन परिस्थितियों में शादी को शून्य घोषित करने के लिए कोर्ट में अर्जी दी जा सकती है, और अगर कोर्ट इन कारणों को सही मानता है, तो शादी को शून्य करार दिया जा सकता है।



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