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Happy Guru Purnima Shlok: गुरु की महिमा का बखान करते हैं ये संस्कृत श्लोक, टीचर्स के साथ जरूर करें शेयर
Sanskrit Shlokas on Guru for Guru Purnima: गुरु पूर्णिमा हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है जो गुरु या शिक्षक के प्रति सम्मान और आभार प्रकट करने के लिए मनाया जाता है। गुरु को ज्ञान का साक्षात स्वरूप माना जाता है। वे शिष्य को अज्ञानता से निकालकर ज्ञान के मार्ग पर ले जाते हैं। गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति असंभव है।
गुरु शिष्य को आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। वे जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने में सहायता करते हैं और शिष्य को आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करते हैं। गुरु शिष्य को नैतिकता, अनुशासन और आत्मसंयम का पाठ पढ़ाते हैं। वे जीवन में सही और गलत के बीच फर्क समझाते हैं और शिष्य को एक आदर्श जीवन जीने की शिक्षा देते हैं।

गुरु हमारी परंपराओं और संस्कृति के संवाहक होते हैं। वे इनको अगली पीढ़ी तक पहुंचाते हैं और हमारी सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखते हैं। वे जीवन की चुनौतियों से निपटने और सफलता प्राप्त करने में शिष्य की मदद करते हैं। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर हम शेयर कर रहे हैं संस्कृत के कुछ चुनिन्दा श्लोक जिससे आप लाभान्वित हो सकते हैं।
Happy Guru Purnima Shlok for Teachers
1.
विना गुरुभ्यो गुणनीरधिभ्यो
जानाति तत्त्वं न विचक्षणोऽपि ।
आकर्णदीर्घायित लोचनोऽपि
दीपं विना पश्यति नान्धकारे ॥
बड़ी से बड़ी आँख रहने के बावजूद बिना प्रकाश के मनुष्य कुछ नहीं देख सकता, वैसे ही मनुष्य कितनी भी विलक्षण प्रतिभा का स्वामी क्यों ना हो, बिना गुरु के उसे गूढ़ ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है।
2.
एकमप्यक्षरं यस्तु गुरुः शिष्ये निवेदयेत् ।
पृथिव्यां नास्ति तद् द्रव्यं यद्दत्वा ह्यनृणी भवेत् ॥
इस श्लोक में गुरु के लक्षण बताये गए हैं। लक्ष्यविहीन, भोगी, संचय करने वाला, ब्रह्मचर्य का पालन ना करने वाला और झूठ बोलने वाला व्यक्ति सही गुरु हो ही नहीं सकता। गुरु का एक लक्ष्य जरुर होता है और वो भोगी प्रवृति का नहीं होता।
Happy Guru Purnima Shlok for Teachers With Hindi Meaning
3.
किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटि शतेन च ।
दुर्लभा चित्त विश्रान्तिः विना गुरुकृपां परम् ॥
बहुत ज्यादा बोलने से कुछ नहीं मिलता, करोड़ों शास्त्रों को पढ़ लेने मात्र से कुछ नहीं होता, सबसे बड़ी बात है मन की शांति। जब तक परम शांति ना मिले तो समझिये कुछ नहीं मिला और परम शान्ति बिना गुरु के नहीं मिल सकती।
4.
गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम् ।
अथा प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः ॥
जैसे राजा दुष्टों पर शासन करता है, पापी लोगों पर यम शासन करता है वैसे ही जिनकी आत्मा जागृत हो सकने लायक है उन पर एक गुरु शासन करता है। जागृत होने का सम्बन्ध यहां अध्यात्म से है।
5.
दुग्धेन धेनुः कुसुमेन वल्ली शीलेन भार्या कमलेन तोयम् ।
गुरुं विना भाति न चैव शिष्यः शमेन विद्या नगरी जनेन ॥
जैसे बिना दूध के गाय, बिना फूल के पेड़, बिना लज्जा के पत्नी, बिना कमल फूल के जल, बिना शम के विद्या और बिना लोगों के शहर शोभा नहीं देते, वैसे ही बिना शिक्षक या गुरु के शिष्य की भी शोभा नहीं है। शिष्य की योग्यता और सफलता उसके शिक्षक पर निर्भर है।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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