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Teachers Day Shlok: संस्कृत के इन श्लोक के साथ अपने गुरु का करें सम्मान, जरूर मिलेगा उनका आशीर्वाद
Teachers Day Shlok with Hindi Meaning: टीचर्स डे, जो हर साल 5 सितंबर को मनाया जाता है, हमारे जीवन में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका को मान्यता देने का एक विशेष अवसर है।
इस दिन, हम अपने गुरुओं के प्रति अपनी श्रद्धा और आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने हमें ज्ञान, प्रेरणा और दिशा प्रदान की है। भारतीय परंपरा में गुरु का स्थान अत्यंत सम्माननीय है और उन्हें ईश्वर से भी ऊँचा माना जाता है। इस अवसर पर, शास्त्रों में वर्णित गुरु के महत्व और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने वाले श्लोकों का संग्रह एक आदर्श तरीका है।
ये श्लोक न केवल हमारी परंपराओं को संरक्षित करते हैं, बल्कि हमारे जीवन में गुरु के योगदान को सम्मानित करने का भी एक सुंदर माध्यम हैं। इस लेख में, हम ऐसे कुछ महत्वपूर्ण श्लोकों को प्रस्तुत करेंगे, जो गुरु के प्रति हमारी श्रद्धा और सम्मान को व्यक्त करते हैं -

दुग्धेन धेनुः कुसुमेन वल्ली शीलेन भार्या कमलेन तोयम् ।
गुरुं विना भाति न चैव शिष्यः शमेन विद्या नगरी जनेन ॥
जैसे बिना दूध के गाय, बिना फूल के पेड़, बिना लज्जा के पत्नी, बिना कमल फूल के जल, बिना शम के विद्या और बिना लोगों के शहर शोभा नहीं देते, वैसे ही बिना शिक्षक या गुरु के शिष्य की भी शोभा नहीं है। शिष्य की योग्यता और सफलता उसके शिक्षक पर निर्भर है।

गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम् ।
अथा प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः ॥
जैसे राजा दुष्टों पर शासन करता है, पापी लोगों पर यम शासन करता है वैसे ही जिनकी आत्मा जागृत हो सकने लायक है उन पर एक गुरु शासन करता है। जागृत होने का सम्बन्ध यहां अध्यात्म से है।

विना गुरुभ्यो गुणनीरधिभ्यो
जानाति तत्त्वं न विचक्षणोऽपि ।
आकर्णदीर्घायित लोचनोऽपि
दीपं विना पश्यति नान्धकारे॥
बड़ी से बड़ी आँख रहने के बावजूद बिना प्रकाश के मनुष्य कुछ नहीं देख सकता, वैसे ही मनुष्य कितनी भी विलक्षण प्रतिभा का स्वामी क्यों ना हो, बिना गुरु के उसे गूढ़ ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है।

किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटि शतेन च ।
दुर्लभा चित्त विश्रान्तिः विना गुरुकृपां परम् ॥
बहुत ज्यादा बोलने से कुछ नहीं मिलता, करोड़ों शास्त्रों को पढ़ लेने मात्र से कुछ नहीं होता, सबसे बड़ी बात है मन की शांति। जब तक परम शांति ना मिले तो समझिये कुछ नहीं मिला और परम शान्ति बिना गुरु के नहीं मिल सकती।

एकमप्यक्षरं यस्तु गुरुः शिष्ये निवेदयेत् ।
पृथिव्यां नास्ति तद् द्रव्यं यद्दत्वा ह्यनृणी भवेत् ॥
इस श्लोक में गुरु के लक्षण बताये गए हैं। लक्ष्यविहीन, भोगी, संचय करने वाला, ब्रह्मचर्य का पालन ना करने वाला और झूठ बोलने वाला व्यक्ति सही गुरु हो ही नहीं सकता। गुरु का एक लक्ष्य जरुर होता है और वो भोगी प्रवृति का नहीं होता।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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