Harivansh Rai Bachchan Poems: हरिवंश राय बच्चन के जन्मदिन पर पढ़ें उनकी 5 सबसे प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ कविताएं

Harivansh Rai Bachchan Poems: 27 नवंबर यानी आज हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक और कवि हरिवंश राय बच्चन की आज 117वीं जयंती है। उनका जन्म 27 नवंबर 1907 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (प्रयागराज) के बाबूपट्टी गांव में एक अवधी हिन्दू परिवार में हुआ था। हिंदी साहित्य को एक नई दिशा देने वाले हरिवंश राय बच्चन सिर्फ एक कवि नहीं थे, बल्कि भावनाओं के ऐसे जादूगर थे जिनकी पंक्तियां आज भी हर उम्र के लोगों के दिल को छूती हैं। खास बात यह है कि उन्होंने अपनी कविताओं में इतनी सरलता और सहजता के साथ जीवन दर्शन को प्रस्‍तुत किया, कि हर पाठक उनसे जुड़ जाता है। बच्चन जी ने अपने जीवनकाल में कई अद्भुत और उम्दा कविताएं लिखी हैं। आइए, आज हरिवंश राय बच्चन के जन्मदिन के मौके पर पढ़ते हैं उनकी कुछ सबसे प्रसिद्ध और सदाबहार कविताएं -

Harivansh Rai Bachchan

मधुशाला

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊंगा प्याला
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला

पथिक बना मैं घूम रहा हूँ, सभी जगह मिलती हाला
सभी जगह मिल जाता साकी, सभी जगह मिलता प्याला
मुझे ठहरने का, हे मित्रों, कष्ट नहीं कुछ भी होता
मिले न मंदिर, मिले न मस्जिद, मिल जाती है मधुशाला

मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला

यम आएगा लेने जब, तब खूब चलूंगा पी हाला
पीड़ा, संकट, कष्ट नरक के क्या समझेगा मतवाला
क्रूर, कठोर, कुटिल, कुविचारी, अन्यायी यमराजों के
डंडों की जब मार पड़ेगी, आड़ करेगी मधुशाला

अग्निपथ

अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!
वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छांह भी,
मांग मत, मांग मत, मांग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

तू न थकेगा कभी,
तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु स्वेद रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

मधुकलश

है आज भरा जीवन मुझमें,
है आज भरी मेरी गागर!

सर में जीवन है, इससे ही
वह लहराता रहता प्रतिपल,
सरिता में जीवन,इससे ही
वह गाती जाती है कल-कल

निर्झर में जीवन,इससे ही
वह झर-झर झरता रहता है,
जीवन ही देता रहता है
नद को द्रुतगति,नद को हलचल,

लहरें उठती,लहरें गिरती,
लहरें बढ़ती,लहरें हटती;
जीवन से चंचल हैं लहरें,
जीवन से अस्थिर है सागर।

है आज भरा जीवन मुझमें,
है आज भरी मेरी गागर!

नभ का जीवन प्रति रजनी में
कर उठता है जगमग-जगमग,
जलकर तारक-दल-दीपों में;
सज नीलम का प्रासाद सुभग,

दिन में पट रंग-बिरंगे औ'
सतरंगे बन तन ढँकता,
प्रातः-सायं कलरव करता
बन चंचल पर दल के दल खग,

प्रार्वट में विद्युत् हँसता,
रोता बादल की बूंदों में,
करती है व्यक्त धरा जीवन,
होकर तृणमय होकर उर्वर।

है आज भरा मेरा जीवन
है आज भरी मेरी गागर!

मारुत का जीवन बहता है
गिरि-कानन पर करता हर-हर,
तरुवर लतिकाओं का जीवन
कर उठता है मरमर-मरमर,

पल्लव का,पर बन अम्बर में
उड़ जाने की इच्छा करता,
शाखाओं पर,झूमा करता
दाएँ-बाएँ नीचे-ऊपर,

तृण शिशु,जिनका हो पाया है
अब तक मुखरित कल कंठ नहीं,
दिखला देते अपना जीवन
फड़का देते अनजान अधर

है आज भरा मेरा जीवन
है आज भरी मेरी गागर!

जल में,थल में,नभ मंडल में
है जीवन की धरा बहती,
संसृति के कूल-किनारों को
प्रतिक्षण सिंचित करती रहती,

इस धारा के तट पर ही है
मेरी यह सुंदर सी बस्ती--
सुंदर सी नगरी जिसको है
सब दुनिया मधुशाला कहती;

मैं हूँ इस नगरी की रानी
इसकी देवी,इसकी प्रतिमा,
इससे मेरा सम्बंध अतल,
इससे मेरा सम्बंध अमर।

है आज भरा मेरा जीवन
है आज भरी मेरी गागर!

पल ड्योढ़ी पर,पल आंगन में,
पल छज्जों और झरोखों पर
मैं क्यों न रहूँ जब आने को
मेरे मधु के प्रेमी सुंदर,

जब खोज किसी की हों करते
दृग दूर क्षितिज पर ओर सभी,
किस विधि से मैं गंभीर बनूँ
अपने नयनों को नीचे कर,

मरु की नीरवता का अभिनय
मैं कर ही कैसे सकती हूँ,
जब निष्कारण ही आज रहे
मुस्कान-हँसी के निर्झर झर।

है आज भरा मेरा जीवन
है आज भरी मेरी गागर!

मैं थिर होकर कैसे बैठूँ,
जब ही उठते है पाँव चपल,
मैं मौन खड़ा किस भाँति रहूँ,
जब हैं बज उठते पग-पायल,

जब मधुघट के आधार बने,
कर क्यों न झुकें, झूमें, घूमें,
किस भाँति रहूँ मैं मुख मूँदे,
जब उड़-उड़ जाता है आँचल,

मैं नाच रही मदिरालय में
मैं और नहीं कुछ कर सकती,
है आज गया कोई मेरे
तन में, प्राणों में, यौवन भर !

है आज मरा यौवन मुझमें,
है आज भरी मेरी गागर ।

भावों से ऐसा पूर्ण हृदय
बातें भी मेरी साधारण
उर से उठ (होठों)कण्ठ तक आतीं
आते बन जातीं हैं गायन,

जब लौट प्रतिध्वनि आती है,
अचरज होता है तब मुझको-
हो आज गईं मधु-सौरभ से
क्या जड़ दीवारें भी चेतन !

गुंजित करती मदिरालय को
लाचार यही मैं करने को,
अपनेसे ही फूटा पड़ता
मुझमें लय-ताल-बंधा मधु स्वर !

है आज भरा जीवन मुझमें,
है आज भरी मेरी गागर ।

गिरि में न समा उन्माद सका
तब झरनों में बाहर आया,
झरनों की ही थी मादकता
जिसको सर-सरिता ने पाया,

जब संभल सका उल्लास नहीं
नदियों से, अबुधि को आईं,
अबुधि की उमड़ी मस्ती को
नीरद भू पर बरसाया,

मलयानिल को निज सौरभ दे
मधुवन कुछ हल्का हो जाता,
मैं कर देती मदिरा वितरित
जाता उर से कुछ भार उतर !
है आज मरा यौवन मुझमें,
है आज भरी मेरी गागर ।

तन की क्षणभंगुर नौका पर
चढ़ कर, हे यात्री, तू आया,
तूने नानाविधि नगरों को
होगा जीवन-तट पर पाया,

जड शुष्क उन्हें देखा होगा
रक्षित सीमित प्राचीरों से,
इस नगरी में पाई होगी
अपने उर की स्वप्निल छाया,

है शुष्क सत्य यदि उपयोगी
तो सुखदायक है स्वप्न सरस,
सुख भी जीवन का अंश अमर,
मत जग से ङर, कुछ देर ठहर ।

है आज मरा यौवन मुझमें,
है आज भरी मेरी गागर ।

जीवन में दोनों आते हैं
मिट्टी के पल, सोने के क्षण,
जीवन से दोनों जाते हैं
पाने के पल, खोने के क्षण

हम जिस क्षण में जो करते हैं
हम बाध्य वही हैं करने को,
हँसने के क्षण पाकर हँसते,
रोते हैं पा रोने के क्षण,

विस्मृति की आई है वेला,
कर, पाँय, न इसकी अवहेला,
आ, भूलें हास रुदन दोनों
मधुमय होकर दो-चार पहर।

है आज मरा यौवन मुझमें,
है आज भरी मेरी गागर।

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

निशा निमन्त्रण

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

हो जाए न पथ में रात कहीं,
मंजिल भी तो है दूर नहीं
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

Story first published: Thursday, November 27, 2025, 8:40 [IST]
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