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How To Find Original Chikankari: चिकनकारी के नाम पर धोखा न खाएं, ऐसे असली और नकली का पता लगाएं
How To Identify Original Chikankari : बाजार में आपको चिकनकारी एंब्रॉयडरी के नाम पर कई आउटफिट मिल जाएंगे। कई बार तो दुकानदार आपको असली चिकनकारी के नाम पर मशीन की कढ़ाई वाला कपड़ा पकड़ा देते हैं। सही जानकारी के अभाव में हम भी नकली-असली में फर्क किए बगैर खरीद लेते हैं।
ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि असली चिकनकारी कढ़ाई को पहचानने का क्या तरीका है। ताकि अगर आप भी चिकनकारी का शौक रखते हैं, तो आपको इसकी असलियत पहचाननी आनी चाहिए।

स्टिच पर दें ध्यान
हाथ से की गई चिकनकारी में कारिगरों के हाथों से जो स्टिच कपड़े पर डाली जाती है, वह बहुत ही सॉफ्ट और जेंटल होती है और वहीं मशीन से कई गई कढ़ाई की एक-एक स्टिच कसी हुई होती है। इतना ही नहीं, हाथ से की गई कढ़ाई में कहीं आपको मोटापन देखने को मिलेगा तो कहीं पर पतलापन, मगर मशीन से की गई कढ़ाई में ऐसा नहीं होता है वह बेहद क्लीन और एक समान सी नजर आती है।
उल्टा करके देखें
अक्सर असली चिकनकारी में कपड़े का उल्टा हिस्सा धागों से बुना हुआ जाल सा दिखेगा।जिसमें हाथ से कढ़ाई किए गए धागे और गांठे दिखाई देंगी। मशीन की कढ़ाई के कारण नकली चिकनकारी का उल्टा हिस्सा साफ-सुथरा नजर आएगा।
हाथ से किया जाता है कॉटन थ्रेड का काम
चिकनकारी कढ़ाई यदि हाथ से की जा रही है तो उसमें कॉटन थ्रेड का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं अगर मशीन वाली चिकनकारी की कढ़ाई है तो उसमें रेशम के धागे भी इस्तेमाल किए जाते हैं। यह कढ़ाई बहुत ही फाइन होती हैं इसलिए हाथों से रेशम के धागों से इसे कर पाना आसान नहीं होता है। चिकनकारी के साथ अगर जरी का काम किया जा रहा है तो उसमें मशीन की मदद ली जाती है। आपको बता दें कि मशीन से जिस कॉटन फैब्रिक पर चिकनकारी का काम किया जाता है, वह आपको बहुत अच्छी क्वालिटी का नजर नहीं आएगा।
ऐसे की जाती है चिकनकारी कढ़ाई
सबसे पहले, अच्छी गुणवत्ता वाले शुद्ध सूती कपड़े का चयन किया जाता है। इसके बाद आप उस कपड़े पर ब्लॉक प्रिंटिंग पूरी करके उसी डिजाइन की कढ़ाई करें। आपको बता दें कि जब चिकनकारी कढ़ाई भारत में आई तो यह सूती की जगह मलमल के कपड़े पर की जाती थी। लेकिन तब इस पोशाक को केवल राज महाराजा ही पहन सकते थे। इसलिए आम आदमी तक पहुंचने के लिए यह कढ़ाई सूती कपड़े पर की जाती थी। हालांकि, अब आप यह कढ़ाई जॉर्जेट, शिफॉन, रेशम और सिंथेटिक कपड़ों पर भी पा सकते हैं।
कैसे भारत पहुंचा चिकनकारी
मुगल बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां अपने साथ चिकनकारी भारत लेकर आई थी। पहले चिकनकारी का काम ईरान में शुरू हुआ। ऐसा कहा जाता है ईरान के इलाके में झीलें बहुत हैं और उसमें स्वान भी हैं। स्वान की लचीली गर्दन से टांके का कांसेप्ट आया और चिकनकारी के काम की शुरुआत हुई। ईरान से यह कला हिंदुस्तान पहुंची।



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