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कानपुर का लेदर है इटली तक मशहूर, कोई नहीं जानता 100 साल पुरानी सीक्रेट तकनीक
Kanpur Leather Industry: आज के दौर में भारतीय लेदर इंडस्ट्री एक बड़ा और मजबूत कारोबार बन चुकी है। यहां बने जूते, बेल्ट और बैग जैसे उत्पाद सिर्फ देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी काफी पसंद किए जाते हैं। भारत कई देशों के साथ चमड़े का व्यापार करता है और वैश्विक बाजार में अपनी अच्छी पकड़ बनाए हुए है। अगर इसके इतिहास की बात करें, तो इसकी शुरुआत औपनिवेशिक दौर से जुड़ी मानी जाती है। खासतौर पर, कानपुर इस उद्योग का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा, जहां से बड़े स्तर पर लेदर का उत्पादन और व्यापार शुरू हुआ। आज इस लेख में हम आपको बताएंगे कि कानपुर में लेदर यानी चमड़े का कारोबार कैसे विकसित हुआ और आज भारत किन-किन देशों के साथ लेदर का व्यापार करता है।

कानपुर के जाजमऊ में कैसे शुरू हुआ चमड़े का कारोबार?
आज कानपुर दुनिया के बड़े लेदर हब में गिना जाता है, लेकिन इसकी शुरुआत काफी साधारण तरीके से हुई थी। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के दौरान यहां सबसे पहले चमड़े का काम सैनिकों की जरूरतों को पूरा करने के लिए शुरू हुआ था। शुरुआत में यह काम छोटे स्तर पर था, लेकिन धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ता गया। 1900 के आसपास जाजमऊ इलाके में पहली टैनरी स्थापित की गई, जिसने इस उद्योग को एक नई दिशा दी। इसके बाद 1960 से 1980 के बीच तैयार चमड़े (फिनिश्ड लेदर) और जूतों के निर्माण में तेजी आई। जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ा, वैसे-वैसे इसकी मांग भी देश और विदेश में बढ़ने लगी। फिर 1990 के बाद के दौर में निर्यात में बड़ा उछाल देखने को मिला, जिससे कानपुर का लेदर उद्योग राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी पहचान बनाने लगा।
कानपुर में कब शुरू हुई चमड़े की फैक्ट्रियां?
कानपुर में चमड़े की फैक्ट्रियों यानी टैनरी की शुरुआत ब्रिटिश शासन के समय हुई थी। 19वीं सदी के अंतिम दौर और 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश सेना और सरकारी जरूरतों के लिए लेदर उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ी। इसी बढ़ती मांग को देखते हुए जाजमऊ इलाके में 1900 के आसपास टैनरी यूनिट्स स्थापित होने लगीं। शुरुआत में ये कारखाने ब्रिटिश प्रशासन के नियंत्रण में थे, लेकिन समय के साथ भारतीय व्यापारियों ने भी इस उद्योग में कदम रखा और अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई। धीरे-धीरे ये फैक्ट्रियां सरकारी और निजी दोनों स्तर पर विकसित हुईं, जिसने कानपुर को देश के प्रमुख लेदर केंद्र के रूप में पहचान दिलाई।
भारत की 'लेदर कैपिटल' क्यों कहलाता है कानपुर?
कानपुर को अक्सर भारत की 'लेदर कैपिटल' कहा जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण है यहां का जाजमऊ इलाका, जिसे एशिया के बड़े टैनरी हब में गिना जाता है। इस क्षेत्र की खासियत यह है कि यहां कच्चे चमड़े की प्रोसेसिंग से लेकर तैयार जूते बनाने तक की पूरी प्रक्रिया एक ही जगह पर होती है। यही वजह है कि कानपुर ने देश में इस उद्योग की पहचान को मजबूत किया है।
कानपुर में किस तरह के जूते बनते हैं?
कानपुर का नाम सबसे ज्यादा लेदर फुटवियर के लिए लिया जाता है। यहां अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से जूते तैयार किए जाते हैं। यहां फॉर्मल लेदर शूज, कैजुअल लेदर फुटवियर, सेफ्टी शूज, इंडस्ट्रियल शूज, सैंडल और स्लीपर्स का उत्पादन बड़े स्तर पर होता है, जो घरेलू बाजार के साथ-साथ निर्यात के लिए भी भेजा जाता है।
कानपुर में लेदर के अलावा और कौन-सी इंडस्ट्री है?
हालांकि, कानपुर की पहचान लेदर से है, लेकिन यहां सिर्फ यही उद्योग नहीं है। शहर में टेक्सटाइल, केमिकल, फिनिशिंग यूनिट्स, पैकेजिंग और मशीन निर्माण से जुड़ी फैक्ट्रियां भी मौजूद हैं। ये सभी सेक्टर मिलकर शहर की औद्योगिक ताकत को और बढ़ाते हैं।
भारत के अलावा किन देशों में होता है बड़ा लेदर कारोबार?
भारत के साथ-साथ कई देश भी लेदर इंडस्ट्री में मजबूत पकड़ रखते हैं। चीन इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जूते बनाने के लिए जाना जाता है। इसके अलावा, ब्राजील, इटली, वियतनाम, बांग्लादेश और इंडोनेशिया भी लेदर उत्पादों के उत्पादन और निर्यात में अहम भूमिका निभाते हैं। जहां इटली अपने लग्जरी फुटवियर के लिए मशहूर है, वहीं ब्राजील कच्चे चमड़े के बड़े निर्यातकों में गिना जाता है।



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