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इस मुगल बेगम की वजह से लखनऊ पहुंचा था चिकनकारी, जानिए इससे जुड़ा मशहूर किस्सा
उत्तर प्रदेश की राजधानी है लखनऊ। इसे नज़ाकत और नफ़ासत के शहर के रूप में भी जाना जाता है। यहां आने वाला हर व्यक्ति ना केवल यहां के लजीज चिकन का लुत्फ उठाता है, बल्कि यहां का चिकनकारी काम भी बेहद मशहूर है। देश के कोने-कोने से लोग यहां पर चिकनकारी वर्क का कपड़ा खरीदने के लिए आते हैं। लखनऊ को लेकर यह मशहूर है कि यहां पर लोग चिकन खाते भी हैं और पहनते भी हैं।

लेकिन क्या आपको पता है कि लखनऊ की मशहूर चिकनकारी कढ़ाई का संबंध वास्तव में मुगल काल से हैं। दरअसल, भारत में चिकनकारी के काम की शुरुआत बादशाह जहांगीर की पत्नी नूरजहां द्वारा की गई थी। तो चलिए आज इस लेख में हम आपको जहांगीर की पत्नी नूरजहां और चिकनकारी के काम के बीच के आपसी कनेक्शन के बारे में बता रहे हैं-
चिकनकारी क्या है?
चिकनकारी वास्तव में महीन कपड़े पर सुई-धागे से की गई कढ़ाई होती है। इसमें धागे के टांकों से हाथों से कारीगरी की जाती है। इसे कई तरह से किया जाता है। वास्तव में, चिकनकारी के 37 प्रकार होते हैं, जिसमें मुर्रे, जाली, बखिया, टेप्ची, पंखड़ी, लौंग जंजीरा, मुंदराजी जाजी, सिद्दौर जाली व टप्पा आदि चिकनकारी के ही अलग-अलग प्रकार हैं। आज लखनऊ की चिकनकारी कढ़ाई पूरी दुनिया में मशहूर है। बता दें कि जब चिकनकारी का काम भारत में शुरू किया गया था, तब मुगल ढाका के मलमल के कपड़े पर धागे से चिकनकारी कढ़ाई करते थे। उस दौर में इन कपड़ो को खरीद पाना हर किसी के बस की बात नहीं थी। इसलिए बेहद कम लोग ही चिकनकारी कढ़ाई के कपड़े को खरीदते व पहनते थे। लेकिन समय के साथ चिकन का काम सूती कपड़े पर भी किया जाने लगा। सूती कपड़े पर चिकनकारी काम को काफी पसंद किया जाता है। आज के समय में सूती ही नहीं, बल्कि सिल्क, जॉर्जेट व शिफॉन जैसे फैब्रिक पर भी चिकनकारी काम किया जाता है।
फारसी शब्द से बना है चिकनकारी
चिकनकारी शब्द के पीछे की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। ऐसा माना जाता है कि यह फारसी भाषा के चाकिन से ही बना है। चाकिन से बना चिकन। चूंकि इसमें कपड़े पर कारीगरी की जाती है, इसलिए इस कला को चिकनकारी नाम दिया गया। चाकिन का वास्तविक अर्थ है किसी कपड़ों पर बेल-बूटे की काशीदकारी करना।
नूरजहां का है चिकनकारी से संबंध
लखनऊ की जिस चिकनकारी कढ़ाई को पूरी दुनिया में बेहद पसंद किया जाता है, उसे भारत लाने का श्रेय मुगल शासक जहांगीर की बेगम नूरजहां को दिया जाता है। भारत में चिकनकारी की शुरुआत को लेकर दो अलग-अलग कहानियां है। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि यह दोनों ही कहानियां नूरजहां से जुड़ी हैं, जो यह साबित करती हैं कि भारत में चिकनकारी की शुरुआत नूरजहां द्वारा ही की गई थी। पहली कहानी के अनुसार, मुग़ल बादशाह जहांगीर की पत्नी नूरजहां ईरान से इस कला को भारत में लाई थीं। उन्होंने यहां पर लोगों को इसके बारे में बताया व सिखाया। वर्तमान में, लखनऊ के लोग इस कला में पारंगत हो गए। वहीं दूसरी कहानी के अनुसार, नूरजहां की एक बंदी दिल्ली से लखनऊ आई, तो उसने चिकनकारी का काम नूरजहां को दिखाया। उन्हें यह बेहद पसंद आया। उन्होंने ना खुद इस कला को सीखा, बल्कि भारत के लोगों को भी इसे सिखाया। धीरे-धीरे इस कढ़ाई ने अपनी एक अलग जगह बना ली।
नवाबों के जमाने में मिला बढ़ावा
ऐसा माना जाता है कि नवाबों के जमाने में भी चिकनकारी को काफी बढ़ावा मिला। लखनऊ को नवाबों का शहर कहा जाता है और नवाबों के जमाने में चिकनकारी कढ़ाई ने नई ऊंचाइयों को छुआ। यहां तक कि खुद नवाब भी चिकन के काम वाले अंगरखे और टोपियां पहना करते थे।
Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्वास्थ्य प्रदात्ता से सलाह लें।



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