टॉयलेट फोबिया : STD और बैक्‍टीरिया की वजह से टॉयलेट जाने से लगता है डर?

यदि आप सार्वजनिक शौचालय (पब्लिक टॉयलेट ) की सीट पर बैठने से पहले सावधानी बरतती हैं-ये सोचकर कि इस पर कई डरावनी चीजें और संक्रमित कीटाणु विराजमान हैं,जो आपको बीमार कर देंगी तो आप कहीं न कहीं टॉयलेट फोबिया से गुजर रही है। इस डर की वजह से आप कई बार यूरिन करने से डरती है और पब्लिक टॉयलेट जाने से कतराती है।

इस फोबिया से गुजर रहे लोग अक्‍सर सार्वजानिक टॉयलेट का उपयोग करने के साथ ही घर पर बने टॉयलेट का उपयोग करने से भी डरा करते है। इस डर के पीछे महिलाओं की सबसे बड़ी समस्‍या होती है STD (सेक्‍सुअली ट्रांस्मिटेड डिसीज) और दूसरे इन्फ़ेक्शन्स का शिकार होने से बचने के लिए महिलाएं लू बेक्‍स लेना ही बंद कर देती है। ये ही आदतें आगे चलकर बहुत खतरनाक साबित हो सकती है।

इसके अलावा औरतों में जर्मोफोबिक भी आम फोबिया होता है। आइए जानते है आखिर क्‍या है टॉयलेट फोबिया और अक्‍सर लोग टॉयलेट से जुड़े किन डर के साथ जीते है।

टॉयलेट फोबिया हो सकता है जानलेवा

टॉयलेट फोबिया हो सकता है जानलेवा

St Austell की एमिली टिटिंगिंग्टन को शौचालय का उपयोग करने का एक डर था और अक्सर वो दो महीनें तक अपना मल रोक दिया करती थी। लगातार कब्‍ज की वजह से उसकी आंतों ने काम करना धीरे धीरे बंद कर दिया, जिसकी वजह से एक दिन हार्ट अटैक से 16 साल की उम्र में एमिली की मुत्‍यु हो गई। यह फोबिया जानलेवा भी साबित हो सकता है।

जर्मोफोबिक

जर्मोफोबिक

हमारे आसपास ऐसी कई महिलाएं है जो जर्मोफ़ोबिक है। हममें से अधिकत लोग यही सोचते हैं कि टॉयलेट सीट्स और नल के हैंडल्स पर कीटाणु विराजमान हैं, पर जहां स्वच्छता को लेकर आपकी चिंता जायज़ हैं, वहीं ये जानना ज़रूरी है कि लू-ब्रेक्स लेने से आपको एसटीडी होने का ख़तरा बिल्कुल नहीं है। इस बारे में डब्ल्यूएचओ शौचालय के इस्तेमाल के बाद हाथ धोने की सलाह देता है, ताकि बैक्टीरियल और वायरल इन्फ़ेक्शन्स से बचा जा सके. फिर भी इन्फ़ेक्शन की संभावना केवल तभी होती है, जब आपको कोई ज़ख्म हो और वो पूरी तरह ठीक न हुआ हो. सार्वजनिक शौचालय के इस्तेमाल से आपको एसटीडीज़ नहीं, बल्कि यूटीआई होने की संभावना हो सक

ऐन्ज़ाइटी कंडिशन

ऐन्ज़ाइटी कंडिशन

ब्रिटेन की नैशनल फ़ोबिक सोसायटी द्वारा कराए गए एक सर्वे के अनुसार, वर्ष 2006-07 में तक़रीबन 40 लाख ब्रिटिश ‘टॉयलेट फ़ोबिया' की समस्या से ग्रस्त थे। तब इस सोसायटी ने इस डिस्ऑर्डर को अपने अधिकार क्षेत्र में ऐन्ज़ाइटी कंडिशन का नाम दिया। कई लोग इससे इतना ज़्यादा प्रभावित होते हैं कि वे घर से बाहर ही नहीं जाना चाहते और वे इस मामले में किसी तरह का चिकित्सकीय परीक्षण भी करवाना चाहते हैं।

इन चीजों का ध्‍यान रखें

इन चीजों का ध्‍यान रखें

क्लमिडिया, गोनोरिया, सिफ़िलिस और जेनाइटल वार्ट्स जैसी एसटीडीज़ संक्रमित व्यक्ति के साथ सेक्शुअल संबंध बनाने से ही फैलती हैं। हालांकि क्रैब्स (प्यूबिस लाइस) या स्केबीज़, सैक्शुअली भी फैलते हैं और इनसे संक्रमित लोगों के कपड़े, चादर या टॉवेल्स के इस्तेमाल से भी फैलते हैं। संक्रमित व्यक्ति की त्वचा से अलग होने के बाद प्राकृतिक वातावरण में पहुंचते ही वायरस लगभग तुरंत मर जाते हैं, टॉयलेट सीट के इस्तेमाल से संक्रमित होने के लिए बड़ी ही आदर्श स्थिति होनी चाहिए-जैसे ही संक्रमित व्यक्ति उठे और संक्रमण के अंश छोड़े, कोई दूसरा व्यक्ति उसके तुरंत बाद टॉयलेट सीट पर बैठे और या तो उसे किसी तरह का ज़ख्म हो या उसकी त्वचा गीली हो और वो इस तरह बैठे कि ज़ख्मवाला या गीला हिस्सा वहां हो, जहां संक्रमित व्यक्ति ने संक्रमण के अंश छोड़े हों. तो आप ही सोचिए कि इसकी कितनी कम संभावना है! ‘‘यदि आप ट्रेन से यात्रा कर रही हैं या फिर कहीं और सार्वजनिक शौचालय का इस्तेमाल कर रही हैं तो अख़बार या टिशू साथ में ज़रूर रखें। टॉयलेट के इस्तेमाल से पहले अख़बार या टिशू बिछा दें. जब आप यात्रा कर रही हों तो हैंड सेनिटाइज़र रखें ये बहुत काम की चीज़ है।''

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हरपीज़ का वायरस थोड़ा ढीठ होता है। संक्रमित व्यक्ति के शरीर से अलग होने के बाद भी यह चार घंटों तक जीवित रह सकता है। इस वायरस से संक्रमित टॉयलेट को यदि कोई दूसरा व्यक्ति इस्तेमाल करता है और उसे त्वचा पर ज़ख्म (जो शरीर के भीतर इस वायरस के प्रवेश का ज़रिया हो सकते हैं) हैं तो वह व्यक्ति भी संक्रमित हो सकता है। लेकिन एक सच ये भी है कि किसी भी शरीर की इम्‍यूनिटी को संक्र‍मित करने के लिए ऐसे वायरस की पर्याप्त संख्या की ज़रूरत हो

Story first published: Thursday, August 17, 2017, 13:02 [IST]
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