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नेशनल आई डोनेशन फोर्टनाइट 2019: भारत में नेत्रदान की स्थिति
नेशनल आई डोनेशन फोर्टनाइट हर साल 25 अगस्त से 8 सितंबर तक मनाया जाता है। इस कैंपेन में नेत्रदान के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाने और लोगों को अंग दान करने के लिए प्रेरित किया जाता है। रिपोर्ट्स की मानें तो भारत जैसे विकासशील देशों में प्रमुख स्वास्थ्य समस्याओं में अंधापन सबसे बड़ी समस्या है।

भारत में हैं सबसे ज्यादा नेत्रहीन
आंकड़ों की मानें तो भारत में लगभग 6.8 बिलियन लोग कॉर्निया की बीमारी की वजह से केवल एक आंख से ही देख सकते हैं। वैश्विक स्तर पर नेत्रहीनों की संख्या 37 बिलियन है जबकि भारत में ही 15 बिलियन लोग अंधे हैं।
कॉर्नियल ब्लाइंडनेस के इलाज के लिए ऑप्टोमेट्रिस्ट और डोनेट की गई आंखों की संख्या हमारे देश में बेहद कम है। इनमें 40,000 ऑप्टोमेट्रिस्ट की जगह केवल 8,000 ऑप्टोमेट्रिस्ट ही हैं। इसके अलावा रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ है कि हर साल लगभग ढाई लाख लोग भारत में नेत्रदान करते हैं जबकि केवल 25 हजार नेत्रहीन भारतीयों को ही 109 नेत्रदान बैंक से आंखें मिल पाती हैं। नेत्रदान की कमी की वजह से भारत में हर साल केवल 10 हजार ही कॉर्नियल ट्रांस्प्लांट किए जाते हैं।
भारत में 153 मिलियन लोगों को रीडिंग ग्लास की जरूरत है लेकिन वो इसकी पहुंच से बहुत दूर हैं। देश में नेत्रहीन लोगों की उच्च संख्या को केवल 20 ऑप्टोमेट्री स्कूलों की सीमित संख्या में जोड़ा जा सकता है जो सालाना 1,000 ऑप्टोमेट्रिस्ट का उत्पादन करते हैं, जिसमें केवल 17 मिलियन लोगों को आबादी में जोड़ा जाता है। 15 मिलियन में से 3 मिलियन बच्चे कॉर्निसल विकारों की वजह से नेत्रहीनता से ग्रस्त हैं।

भारत में नेत्रदान
अपनी मृत्यु के बाद अंग या नेत्र दान करके आप किसी इंसान को जीवनदान दे सकते हैं। आपके किसी भी अंग के दान करने से किसी इंसान की जिंदगी संवर सकती है। मरणोपरांत एक आंख किसी नेत्रहीन व्यक्ति को दान कर कॉर्नियल ट्रांस्प्लांटेशन की मदद से सर्जरी के जरिए नेत्रहीन व्यक्ति को आंखों की रोशनी दी जा सकती है। इसमें क्षतिग्रस्त हुए कॉर्निया को नेत्र दानकर्ता के स्वस्थ कॉर्निया से बदल दिया जाता है।
भारत में अंगदान और प्रत्योरोपण को बढ़ावा देने और इस पहलू पर सकारात्मक बदलाव लाने के लिए भारत सरकार ने मानव अंग अधिनियम प्रत्यारोपण 1994 बनाया था। इस प्रोग्राम को पूरा करने के लिए कोई भी प्रभावी कार्य नहीं किए गए। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में फिर भी थोड़ा अंगदान का कार्य किया जाता है। तमिलनाडु में 302 और आंध्र प्रदेश में 150 अंगदान किया जाता है। अंगदान करने के मामले में इन दोनों राज्यों के बाद कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और केरल का नाम आता है।

50 फीसदी नेत्रदान बेकार हो गए
नेत्रदान को लेकर फैलाई गई जागरूकता के परिणामस्वरूप जो नेत्रदान किए जाते हैं उन्हें अस्पताल इसलिए बचाकर रख लेते हैं कि कहीं वो वेस्ट ना हो जाएं। रिपोर्ट के अनुसार भारत में अप्रैल 2018 से मार्च 2019 तक 52 हजार नेत्रदान किए गए थे। हालांकि, कॉर्नियल ट्रांस्प्लांट की संख्या देश में महज 28 हजार थी।
लगभग 50 फीसदी कॉर्निया इस्तेमाल नहीं किए जाते हैं लेकिन रखे-रखे खराब हो जाते हैं। ये स्थिति एक राज्य नहीं बल्कि पूरे देश की है। दान की गई कॉर्निया को केवल 6 से 14 दिनों तक ही रखा जा सकता है और 14 दिन के बाद ये खराब हो जाती है।
इसका एक कारण यह भी है कि हमारे देश में अच्छे उपकरणों से युक्त आई बैंक उपलब्ध नहीं है। भारत के आई बैंकों में बहुत ही कम मशीनें और नेत्र सर्जन मौजूद हैं।

नेत्रदान से क्यों हिचकते हैं लोग
21वी सदी में इतना विकास और तरक्की करने के बाद भी लोगों को नेत्रदान करने में हिचकिचाहट होती है। जागरूकता की कमी, नेत्रदान से जुड़े भ्रमों, सामाजिक कलंक, प्रोत्साहन की कमी और अंधविश्वास के कारण लोग नेत्रदान करने से कतराते हैं।
दान के लगभग 4 दिन के अंदर ही कॉर्निया ट्रांस्प्लांट करना जरूरी होता है। कॉर्निया परिरक्षण की विधि के आधार पर और मृत्यु के तुरंत बाद आंख के ऊतकों को सर्जरी से हटाने के 4 दिन के अंदर ट्रांस्प्लांट करना होता है।
हाल ही में किए गए एक सर्वेक्षण में नेत्रदान के बारे में गलत धारणाएं सामने आई हैं, जिसमें बताया गया है कि कुल 641 शहरी लोगों में से 28 प्रतिशत का मानना है कि अंग दान करने वालों को कोई जीवनरक्षक उपचार नहीं मिलता है जबकि 18 प्रतिशत का मानना है कि इससे उनका शरीर विकृत कर दिया जाता है।
देश में नेत्रदान को लेकर वर्तमान स्थिति बदलने के लिए भारत सरकार विभिन्न जागरूकता अभियान और उपाय कर रही है। वर्ष 2003 की तुलना में दानकर्ताओं की संख्या में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है। हालांकि, दान की गई कॉर्निया के उचित संरक्षण के लिए अस्पतालों में बेहतर उपकरण लगाए जाने चाहिए।
इसके अलावा भारत का नागरिक होने के नाते आपको भी अंग दान जैसे महान कार्य में अपना सहयोग देना चाहिए। कोई भी व्यक्ति नेत्र दाता (कोई भी आयु वर्ग या लिंग), चश्मा लगाने वाले मधुमेह रोगी, हाई बीपी के मरीज, अस्थमा के रोगी नेत्रदान कर सकते हैं।



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