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72 साल तक लोहे के फेफड़ों से सांस लेते रहे Paul Alexander, क्या होता है Iron Lungs और कैसे करता है काम
Iron Lung Man Dies : अमेरिका में 70 साल से ज्यादा समय तक 'आयरन लंग' यानी 'लोहे के फेफड़े' की मदद से जीने वाले पॉल अलेक्जेंडर ने 78 साल की उम्र में इसी मशीन में आखिरी सांस ली। अलेक्जेंडर को पोलियो पॉल और 'द मैन इन द आयरन लंग' के नाम जाना जाता था।
दरअसल पॉल अलेक्जेंडर को 1952 में पोलियो हो गया था, जब वह सिर्फ छह साल के थे। पोलियो के लक्षण विकसित होने के बाद उन्हें टेक्सास के अस्पताल ले जाया गया। उनके फेफड़े खराब होने की वजह से उनको लोहे के बने बॉक्स ( आयरन लंग) के अंदर रखा गया। इसके बाद 72 साल इस मशीन में बिताने के बाद इस दुनिया को अलविदा कह दिया। पॉल अलेक्जेंडर की मौत के बाद से ही आयरन लंग्स चर्चा का विषय बन गया हैं।

आइए जानते हैं आखिर क्या होता है आयरन लंग (Iron Lung) और कैसे ये लोहे के फेफड़े करते है काम?
'आयरन लंग्स' क्या होता है?
मेडिकल में इसे कैबिनेट रेस्पिरेटर, नेगेटिव प्रेशर वेंटिलेटर, टैंक रेस्पिरेटर जैसे कई नामों से जाना जाता है। 1927 में इसके अविष्कार के बाद से यह मशीन जीवनरक्षक की तरह काम कर रहा है। आयरन लंग्स मशीन दिखने बिल्कुल लौहे के ताबूत की तरह दिखता है। 1952 में अमेरिका में फैली पोलियो की महामारी ने ज्यादातर बच्चे को शिकार बनाया था। इसी महामारी का शिकार 6 साल के पॉल अलेक्जेंडर भी हुए थे। पोलिया की वजह से पॉल के फेफड़े खराब हो गए और उन्हें सांस लेने की दिक्कत होने लगथी। उनकी जान बचाने के लिए तब आयरन लंग्स का इस्तेमाल किया गया।
1927 में पहली बार इस्तेमाल में लिया
हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में फिलिप ड्रिंकर ने लुईस अगासीज़ शॉ ने मिलकर 1927 में आयरन लंग्स का आविष्कार किया था। 1928 में इसका पहली बार इस्तेमाल कर एक छोटी बच्ची की जान बचाई गई थी। ड्रिंकर कोयला-गैस विषाक्तता के ट्रीटमेंट को लेकर रिसर्च कर रहे थे। इस दौरान उन्हें एक चीज समझ में आई कि आयरन लंग्स की मदद से सांस लेने में तकलीफ वाले मरीजों और खराब फेफड़ों से जूझ रहे लोगों की जान बचाई जा सकती है।

कैसे काम करता है आयरन लंग्स?
लोहे के फेफड़े यानी आयरन लंग्स स्टील से बने होते हैं। इसके आगे सिर रखने के लिए एक खुली जगह होती है और वहां एक रबर कॉलर लग रहता है जिसके जरिए मरीज का सिर बाहर की तरफ निकला होता है। पहला आयरन फेफड़ा एक इलेक्ट्रिक मोटर और कुछ वैक्यूम क्लीनर से एयर पंप जरिए चलाया जाता था। यह मशीन एक वेंटिलेशन (ईएनपीवी) के जरिए काम करती है। इसका निर्माण इस तरह से किया गया है कि मरीज के फेफड़ों तक आराम से हवा पहुंच पाती और पर्याप्त मात्रा में मरीज तक ऑक्सीजन मिलता। मरीज की मांसपेशियां काम न करने की एवज में यह मशीन के जरिए आराम से ऑक्सीजन पहुंच पाती थी। इस मशीन की खासियत यह थी कि इसके अंदर का पंप हर समय चलता रहता है जिसके जरिए मरीज जिंदा सांस ले पाता है।
Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्वास्थ्य प्रदात्ता से सलाह लें।



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