World Hearing Day 2023 पर WHO इंडिया ने केरल की रिजवाना का लगाया पोस्टर, जानिए क्या है कारण

WHO Poster Girl Rizwana

केरल की रहने वाली रिजवाना ने पहली बार 6 साल की उम्र में बारिश की बूंदों की आवाज, चिड़ियों की चहचहाहट अपने कानों से सुनी। इससे पहले रिजवाना सुन नहीं सकती थी। रिजवाना 6 साल की उम्र से पहले नहीं जानती थी कि उसके पैरों की पायल इतना सुंदर म्यूजिक भी निकाल सकती है, या फिर उसे अपनी मां की आवाज पहली बार सुनने से इतनी ज्यादा खुशी महसूस हो सकती है।

रिजवाना जन्म से ही न सुनने में असमर्थ थी, लेकिन कॉक्लियर इम्प्लांट उसके लिए किसी जादू से कम नहीं था। कॉक्लियर इम्प्लांट के कारण रिजवाना पहली बार अपने आस-पास के शोर को, अपनी मां की आवाज को सुन पाई। कॉक्लियर इम्प्लांट ने रिजवाना को उम्रभर ना सुन पाने की समस्या से दूर कर दुनिया को सुनने और अपने सपनों को पूरा करने में मदद की।

3 मार्च को वर्ल्ड हियरिंग डे की शाम, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भारत ने रिजवाना की कहानी को अपने होम पेज पर रखा। समय रहते रिजवाना का सही इलाज हो सका, जिस कारण आज वो कोट्टायम के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में MBBS की पढ़ाई कर पा रही है। उन सभी लोगों के लिए रिजवाना एक मिसाल है जो पैदाइश से ही सुन नहीं पाते हैं। रिजवाना ने दुनिया के सामने एक उदाहरण पेश किया कि कैसे शुरुआती नवजात की जांच और लगातार इलाज करवाने पर ना सुनने वाले बच्चे भी सुन सकते हैं।

WHO भारत ने रिजवाना की कहानी को भारत के लाखों लोगों तक पहुंचाने के लिए उसका पोस्टर अपने पेज पर लगाने का निर्णय लिया। यह रिजवाना के माता-पिता - अब्दुल रशीद और सबिता की मेहनत, दृढ़ संकल्प और धैर्य था, जिसके कारण कॉक्लियर इम्प्लांटेशन की मदद से उसे सुनने और बोलने में सक्षम बनाया।

रिजवाना जब एक साल की थी तब उसके माता-पिता को उसके ना सुन पाने की समस्या के बारे में पता चला। जिसके बाद से ही उसके माता-पिता ने उसे स्पीच थेरेपी दिलाने का निर्णय लिया और घर पर ही पढ़ाने की कोशिश की। लेकिन जब रिजवाना के पेरेंट्स को कॉक्लियर इम्प्लांटेशन के बारे में पता चला तो उन्होने 6 साल की रिजवाना का कॉक्लियर इम्प्लांटेशन करवाया। जिसके बाद से रिजवाना सुनने लगी।

कॉक्लियर इम्प्लांट एक इलेक्ट्रॉनिक हियरिंग डिवाइस है, जिसे इम्प्लांट करने के बाद व्यक्ति के सुनने की क्षमता वापस आ सकती है। कोक्लियर इंप्लांट सर्जरी बेहोश करके की जाती है। सर्जन मरीज के कान के पीछे मस्तूल की हड्डी को खोलने के लिए एक चीरा लगाते हैं। जिसके बाद चेहरे की नस की पहचान करके कोक्लियर का उपयोग करने के लिए उनके बीच एक रास्ता बनाया जाता है और इसमें इलेक्ट्रोड्स को फिट कर दिया जाता है।

Image Credit: WHO India

Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी भी तरह की मेडिकल सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या या सवाल के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या किसी योग्य व अनुभवी स्‍वास्‍थ्‍य प्रदात्ता से सलाह लें।

Story first published: Saturday, March 4, 2023, 13:16 [IST]
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