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Apara Ekadashi Vrat Katha: अपरा एकादशी के दिन जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, सभी पापों और प्रेत योनि से मिलेगी मुक्ति
Apara Ekadashi 2026 Vrat Katha: सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। हर माह में दो बार एकादशी का व्रत रखा जाता है, एक कृष्ण में और दूसरा शुक्ल पक्ष में। हिंदू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है। इसे फलदा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस साल अपरा एकादशी 13 मई दिन बुधवार को रखा जाएगा। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान है। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति अपरा एकादशी का व्रत रखता है, उसे कई गुना अधिक पुण्यों की प्राप्ति होती है।

इस एकादशी के महत्व के बारे में स्वयं श्री कृष्ण ने धर्मराज युद्धिष्ठिर को बताया था। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने के साथ व्रत रखने से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन पूजा के दौरान अपरा एकादशी व्रत कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। मान्यता है कि इसके पाठ के बिना व्रत अधूरा माना जाता है। तो आइए, जानते हैं अपरा एकादशी की व्रत कथा -
अपरा एकादशी 2026 कब है?
एकादशी तिथि प्रारंभ - 12 मई 2026 को दोपहर 02 बजकर 52 मिनट तक
एकादशी तिथि समाप्त - 13 मई 2026 को दोपहर 01 बजकर 29 मिनट
एकादशी पारण समय - 14 मई 2026 को सुबह 05 बजकर 31 मिनट से 08 बजकर 14 मिनट एक
अपरा एकादशी की व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में महीध्वज नाम के एक अत्यंत धर्मपरायण और न्यायप्रिय राजा राज्य करते थे। उनका छोटा भाई वज्रध्वज स्वभाव से बिल्कुल विपरीत था। वह अत्याचारी, क्रूर और अधर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति था। अपने बड़े भाई से वह मन ही मन ईर्ष्या करता था। इसी द्वेष के कारण एक रात उसने छलपूर्वक राजा महीध्वज की हत्या कर दी और उनके शव को जंगल में एक पीपल के वृक्ष के नीचे दबा दिया।
असमय और अप्राकृतिक मृत्यु होने के कारण राजा महीध्वज को प्रेत योनि प्राप्त हुई। उनका सूक्ष्म शरीर उसी पीपल के पेड़ पर भटकने लगा और आसपास अशांति फैलाने लगा। कुछ समय बाद वहां से महान तपस्वी धौम्य ऋषि का गुजरना हुआ। अपनी दिव्य दृष्टि से उन्होंने उस प्रेत की वास्तविकता जान ली और समझ गए कि वह कोई साधारण आत्मा नहीं, बल्कि राजा महीध्वज हैं।
ऋषि धौम्य ने करुणा दिखाते हुए उन्हें प्रेत योनि से मुक्त कराने का निश्चय किया। उन्होंने विधिपूर्वक अपरा एकादशी का व्रत किया, भगवान विष्णु की आराधना की और व्रत से प्राप्त समस्त पुण्य राजा महीध्वज को समर्पित कर दिया। ऋषि की भक्ति और प्रार्थना से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए।
श्रीहरि की कृपा से राजा महीध्वज को प्रेत योनि से मुक्ति मिली। उन्हें दिव्य स्वरूप प्राप्त हुआ और अंततः वे स्वर्ग लोक को प्रस्थान कर गए। इस प्रकार अपरा एकादशी के पुण्य प्रभाव से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।
मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और विधि-विधान से अपरा एकादशी का व्रत करता है, उसे मृत्यु के बाद उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है। यदि कोई व्रत न भी रख सके, तो इस व्रत कथा को सुनने मात्र से भी पुण्य फल प्राप्त होता है।



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