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इन मंत्रों से करें दिन की शुरूआत, जाग उठेगी सोई किस्मत
सुबह का समय ऐसा होता है, जिसमें इंसान ईश्वर और प्रकृति का सानिध्य पाकर असीम शांति का अनुभव करता है। इस समय सभी दैवीय शक्तियां जागृत हो जाती है। ये समय आने वाले दिन की नींव रखने का एक अनमोल अवसर है। प्राचीन भाषा संस्कृत में ऐसे कई श्लोक जो किसी की सुबह की दिनचर्या को ध्यान के अभ्यास में बदल सकती है। ये श्लोक मात्र शब्द नहीं हैं; वे कंपन हैं जो ब्रह्मांड की ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ प्रतिध्वनित होते हैं।
इनमें आत्मा को शांत करने और आंतरिक शांति की भावना लाने की शक्ति होती है। ये श्लोक धर्म से परे हैं और उन लोगों की मदद करते हैं जो इन प्राचीन मंत्रों की शक्ति का उपयोग करना चाहते हैं।

इनका सच्चे मन से शुद्ध उच्चारण कर व्यक्ति दिव्य आशीर्वाद का आह्वान कर सकता है जो सफलता, ज्ञान और कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। यहां हम आपको ऐसे तीन चमत्कारिक श्लोक बताने वाले है, जिनका उच्चारण कर आप अपने दिन को बेहतर और आनंदित बना सकते है।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती ।
करमूले तु गोविंदः प्रभाते करदर्शनम् ॥
अर्थ: हथेली के शीर्ष पर देवी लक्ष्मी का निवास है , और हथेली के मध्य में देवी सरस्वती का निवास है, हथेली के नीचे श्री गोविंद का निवास है ,इसलिए सुप्रभात के समय में हस्त दर्शन कर मैं आपका स्मरण कर प्रणाम करता हूं।
श्लोक का महत्व: इस श्लोक का पाठ करने से व्यक्ति पूरे दिन अपने कार्यों में समृद्धि और बुद्धि को आमंत्रित करता है। यह भौतिक और आध्यात्मिक धन दोनों के महत्व पर जोर देता है और सीखने और ज्ञानोदय की खोज को प्रोत्साहित करता है। हालांकि, इस श्लोक की एक और व्याख्या है जो मनुष्य और उसके कर्म के बारे में बात करती है और उसे पता होना चाहिए कि उसका हाथ क्या करता है, क्योंकि हाथ सभी कर्मों के लिए जिम्मेदार है। हमें अपने हाथों में मौजूद अनंत क्षमताओं पर विश्वास करना चाहिए और हर समय हम जो करते हैं उससे सावधान रहना चाहिए।
ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी भानु: शशि भूमि सुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्र शनि राहु केतव सर्वे ग्रहा शांति करा भवंतु॥
अर्थ: हे ब्रह्मा, हे विष्णु, हे शिव आप तीनों से ही इस सृष्टि पर सब कुछ चलती है। हे तीनों लोकों के स्वामी आप सूर्य, चंद्रमा, भूमि, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु सभी ग्रहों को शांत करें।
श्लोक का महत्व: यह श्लोक हिंदू देवताओं की त्रिमूर्ति - ब्रह्मा निर्माता, विष्णु संरक्षक, और शिव विध्वंसक - को समर्पित है। इस श्लोक का पाठ एक शक्तिशाली आह्वान है जो इन दिव्य शक्तियों और प्रकृति की अन्य शक्तियों जैसे सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध और बृहस्पति आदि का आशीर्वाद मांगता है। ऐसा माना जाता है कि सुबह के समय इस मंत्र का जाप करने से दैनिक कार्यों और दीर्घकालिक लक्ष्यों की सुचारू प्रगति में सहायता मिलती है। ऐसा भी कहा जाता है कि यह मंत्र बुरे सपनों को नष्ट कर देता है और आपकी सुबह को और अधिक शुभ बना देता है।
समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले ।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे ॥
अर्थ: हे, सर्व-प्रेमी धरती माता, जिसका निवास स्थान महासागर और छाती के रूप में पर्वत हैं, भगवान विष्णु के दिव्य साथी, जो ब्रह्मांड के स्वामी है, मैं आपको पूरी ईमानदारी से नमन करता हूं। कृपया मुझे आशीर्वाद दें और आपको अपने पैरों से छूने के लिए मुझे क्षमा करें।
श्लोक का महत्व: यह श्लोक धरती माता को सुबह का नमस्कार है, जिसे यहां भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में संबोधित किया गया है। आपको रोज सुबह अपने पैर जमीन पर छूने से पहले इसका पाठ करना है। यह अभ्यास प्रकृति और सभी जीवित प्राणियों के प्रति सम्मान की भावना पैदा करता है। यह उस धरती पर सावधानी से और सोच-समझकर कदम बढ़ाने की हमारी ज़िम्मेदारी की याद दिलाता है, जो हमें सहारा और पोषण देती है।



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