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Daura Kaun Uthata Hai: छठ पूजा प्रसाद का दउरा कौन उठाता है? जानें नंगे पैर ही क्यों जाया जाता है घाट
Chhath Puja Me Daura Kaun Uthata Hai: लोक आस्था का महापर्व छठ पूजा में दउरा का खास महत्व है। दउरा में मौसमी फल, सूप, पूजा सामग्री, और नारियल भरकर अर्घ्य के लिए घाट ले जाया जाता है। श्रद्धालु इसे सिर पर रखकर नंगे पांव घाट तक जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दउरा कौन उठा सकता है?

छठ पर्व को शुद्धता और आस्था का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर मनाया जाता है और चार दिनों तक चलता है। इस दौरान व्रती 36 घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं और सूर्य भगवान की उपासना करते हैं। माना जाता है कि मां छठी की कृपा से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
छठ पूजा में किसे उठाना चाहिए दउरा?
झारखंड और बिहार में परंपरा के अनुसार, छठ पूजा के दउरा को सिर पर लेकर घाट तक पति ही जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इससे सूर्य का आशीर्वाद मिलता है और पति के सहयोग से व्रत सफल होता है। मान्यता है कि पति के इस सहयोग से उनकी आयु लंबी होती है और पत्नी का सुहाग अजर-अमर रहता है।
कहा जाता है कि छठ पूजा की शुरुआत सती अनुसुइया ने की थी। उस समय उनके साथ उनके पति अत्रि ऋषि थे, और उन्होंने फल व पूजा सामग्री से भरा दउरा सिर पर रखकर नंगे पांव घाट तक यात्रा की थी, जिससे उनकी मनोकामना पूरी हुई थी। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि पति ही दउरा सिर पर लेकर घाट जाते हैं। अगर पति उपलब्ध न हो, तो पुत्र, पुत्री, या परिवार का अन्य सदस्य भी दउरा ले जा सकता है।
नंगे पांव घाट जाने का महत्व
छठ पूजा में शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। श्रद्धालु साफ-सुथरे फल और पवित्र धोती-साड़ी पहनकर पूजा करते हैं। घाट तक नंगे पांव जाने का महत्व इसलिए है क्योंकि जूते-चप्पल अशुद्ध माने जाते हैं। जिस प्रकार पूजा में धोती का उपयोग शुद्धता का प्रतीक माना जाता है, वैसे ही नंगे पांव चलने से दउरा और पूजा की पवित्रता बनी रहती है।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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