Dev Uthani Ekadashi Vrat Katha: देवउठनी एकादशी व्रत में जरूर पढ़ें ये कथा, मिलेगा अश्वमेघ यज्ञ जितना फल

Dev Uthani Ekadashi Vrat Katha: साल में 12 एकादशी आती हैं, एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। हालांकि सभी एकादशी का अपना अलग महत्व होता है लेकिन देव उठनी एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है। इस बार देव उठनी एकादशी 1 नवंबर को मनाई जाएगी वहीं कुछ लोग 2 नवंबर को भी मनाने वाले हैं। मान्यता है कि चार महीनों की योगनिद्रा के बाद जब भगवान विष्णु जागते हैं, तो पूरे ब्रह्मांड में उत्सव का माहौल बन जाता है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाने वाली देवउठनी एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) न केवल व्रत और पूजा का पर्व है, बल्कि यह शुभ समय माना जाता है जब सृष्टि में पुनः जीवन का संचार होता है।

ऐसा कहा जाता है कि इस दिन देवउठनी एकादशी व्रत कथा सुनने या पढ़ने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ जितना पुण्य फल प्राप्त होता है। इस पावन कथा में छिपा है वह रहस्य, जो भक्तों के जीवन में सौभाग्य, समृद्धि और मोक्ष का द्वार खोल देता है।

आइए जानें क्यों और कैसे भगवान विष्णु इस दिन योगनिद्रा से जागते हैं, और इस कथा में कौन-सा दिव्य संदेश छिपा है। साथ ही देव उठनी एकादशी की आरती महत्व और पूजा विधि भी जान लेते हैं।

Dev Uthani Ekadashi Vrat Katha

देव उठनी एकादशी की व्रत कथा

प्राचीन समय की बात है महिष्मती नगरी में शंख नामक एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। वे अत्यंत दयालु, सत्यनिष्ठ और धर्म के मार्ग पर चलने वाले राजा थे। वे सदैव प्रजा के हित में कार्य करते थे और भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। एक दिन राजा ने महर्षि नारद जी से पूछा- हे मुनिवर! कृपया बताइए कि कौन-सी एकादशी ऐसी है, जिसके व्रत और कथा के श्रवण से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है और जन्म-जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं? नारद जी बोले- हे राजन! कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहते हैं।

इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। इस व्रत को करने और कथा सुनने से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इस व्रत से व्यक्ति को सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति मिलती है और अंत में विष्णुलोक की प्राप्ति होती है। राजा शंख ने श्रद्धा पूर्वक इस व्रत का पालन किया। उन्होंने प्रातः स्नान करके भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा की, दीपदान किया, तुलसीपत्र से अर्चन किया और पूरे दिन उपवास रखा।

रात में भगवान विष्णु की कथा सुनकर उन्होंने जागरण किया और अगले दिन द्वादशी को दान-पुण्य कर व्रत का पारण किया। इस व्रत के प्रभाव से राजा शंख के सारे पाप नष्ट हो गए। मृत्यु के बाद वे विष्णुलोक को प्राप्त हुए और अनंत काल तक सुख भोगने लगे। इस प्रकार देवउठनी एकादशी व्रत न केवल राजा शंख को मोक्ष प्रदान करने वाला बना, बल्कि सभी मनुष्यों के लिए एक आदर्श बन गया।

आरती श्रीहरि विष्णु भगवान की

जय जय जय श्री हरि भगवान।
जय लक्ष्मीपति जग के प्राण॥

जय नारायण जगत के धाता।
भक्त जनों के संकट हर्ता॥

गदाधर विष्णु जगत के नाथ।
जन हितकारी सुंदर हाथ॥

गरुड़ वाहना पीताम्बर धारी।
चतुर्भुज रूप शंख चक्रधारी॥

जय जय श्री हरि नारायण।
जय लक्ष्मीपति जग पालन॥

जग पालन कर दीन दयाला।
भक्त जनों के संकट टाला॥

देव उठनी आज सुहानी।
खुले विष्णु के नेत्र दिवानी॥

चार महीने की थी निद्रा।
अब जग में फैली शुभ सुधा॥

तुलसी संग हुआ विवाह।
सुख संपत्ति का हुआ प्रवाह॥

जय देव उठनी एकादशी माता।
भक्तों की मनोकामना पूरी करता॥

जो भक्ति भाव से गावे आरती।
उनके सब संकट हो जाए भारी॥

जय जय जय श्री हरि भगवान।
जय लक्ष्मीपति जग के प्राण॥

श्री विष्णु जी की आरती

ॐ जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट,
दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

जो ध्यावे फल पावे,
दुख बिनसे मन का।
स्वामी दुख बिनसे मन का।
सुख सम्पत्ति घर आवे,
सुख सम्पत्ति घर आवे,
कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

मात पिता तुम मेरे,
शरण गहूँ किसकी।
स्वामी शरण गहूँ किसकी।
तुम बिन और न दूजा,
तुम बिन और न दूजा,
आस करूँ जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम पूरन परमात्मा,
तुम अंतर्यामी।
स्वामी तुम अंतर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर,
पारब्रह्म परमेश्वर,
तुम सबके स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम करुणा के सागर,
तुम पालनकर्ता।
स्वामी तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी,
मैं सेवक तुम स्वामी,
कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम हो एक अगोचर,
सबके प्राणपति।
स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय,
किस विधि मिलूँ दयामय,
मुझे दरस दिखलाओ॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

दीन बंधु दुख हरता,
ठाकुर नाम तुम्हारो।
स्वामी नाम तुम्हारो।
जो कोई तुमको ध्यावे,
जो कोई तुमको ध्यावे,
फल पावे अपारो॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

बालमीक अदिक मुनीन्द्र,
भजि न सके तुमको।
स्वामी भजि न सके तुमको।
मैं अति दीन दरिद्र,
मैं अति दीन दरिद्र,
सुख दे मुझको॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

विषय विकार मिटाओ,
पाप हरौ देवा।
स्वामी पाप हरौ देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
संतन की सेवा॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

देव उठनी एकादशी व्रत का महत्व

वैसे तो हर एकादशी अपने आप में खास होती है लेकिन देव उठनी एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से इस दिन व्रत रखते हैं, वे जीवन के सभी दुखों से मुक्ति पाते हैं। भगवान विष्णु की पूजा, तुलसी की परिक्रमा, और यह कथा सुनने या सुनाने से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ जितना फल और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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