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Ramzan या फिर Ramadan? दोनों में सही कौन सा है और फर्क क्या है जानते हैं इस्लामिक स्कॉलर से
इस्लामिक कैलेंडर के 9वें महीनें रमजान का पाक महीना चल रहा है, जिसमें दुनियाभर में इस्लाम को मानने वाले रोजा और इबादत में मशगूल हैं। दुनिया भर में, मुसलमान रमज़ान के पूरे महीने में रोज़ा रखते हैं, लगभग 15 घंटे से ज्यादा बिना कुछ खाए-पिए रोजा अल्लाह पाक की इबादत करते हैं। नमाज पढ़ते हैं, चैरिटी करते हैं, लोगों की मदद करना, अपनी जबान से किसी को दुख ना पहुंचाना, कोई बुरा काम ना करना ये सब एक रोजेदार को करना होता है। रोजे के दौरान सेक्स ना करना, फालतू की बातों से बचना भी शामिल है। यहां पर हम बात रमजान और रमादान की करने जा रहे हैं, जो पिछले कुछ दिनो से सोशल मीडिया पर भी ट्रेंड कर रहा है। रमज़ान सही शब्द है या रमादान सही शब्द है, लोग इसके बारें में जानने के लिए काफी उत्सुक रहे हैं, क्योंकि भारत में जो शब्द इस्तेमाल होता आ रहा है वो है रमज़ान, लेकिन पिछले कुछ सालों से लोगों ने इसे रमादान कहना शुरू कर दिया है। इसमें सही और गलत की बात नहीं है कि कौन सा शब्द सही है और कौन सा गलत, सही दोनों है, लेकिन रमादान क्यों कहने लगे हैं इसकी वजह जानते हैं-
हमने मौलाना अंसार साहब से बात की तो उन्होंने इस बारें में हमें विस्तार से बताया कि क्यों रमजान(Ramzan) को रमादान (Ramadan) कहना शुरू कर दिया गया है।

फर्क सिर्फ भाषा को लेकर
मौलाना अंसार ने बताया कि रमज़ान और रमादान में फर्क सिर्फ भाषा को लेकर है, वर्ना और कोई फर्क नहीं हैं। उन्होंने बताया कि रमादान अरबी लैग्वेज का शब्द है वहीं रमजान उर्दू का। वहीं भारत में उर्दू अधिक बोली जाती है तो रमजान कहा जाता है।
अरबी और उर्दू के बीच प्रनाउंस करने का फर्क
मौलाना साहब बताते है कि अरबी भाषा में 'ज़्वाद' (ض) लैटर का स्वर अंग्रेजी में जेड (Z) के बजाय डी का कंपाउंड साउंड (ḍād) सुनाई देता है। यही वजह है कि अरबी में इसे रमजान की बजाय रमादान बोला जाता है।

भारत के लोगों का खाड़ी देशों में काम करना
वहीं इसकी एक दूसरी बड़ी वजह है भारत के लोगों का खाड़ी देशों में जाकर बसना और वहां पर नौकरी करना। इसें हम ग्लोबलाइजेशन का कारण भी मान सकते हैं। जो वहां काम करते हैं रहते हैं वो रमादान ही लिखते हैं और बोलते भी हैं, अगर उनको रमजान की मुबारकबाद भी देनी होती है तो वो रमजान मुबारक ना कह कर रमादान मुबारक कहते हैं। वहां रह रहे और काम कर रहे लोगों पर अरबी भाषा का फर्क पड़ा है।

लेकिन इस्लाम को मानने वालों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि रमजान कहा जाए या फिर रमादान बोला जाए, उनको बस इस बात से फर्क पड़ता है कि उनके रोजे पूरे हो, वो इबादत कर सकें, साथ ही रमजान के महीने में ज्यादा से ज्यादा अच्छे काम कर सकें, बुरे कामों से दूरी बनाकर रखें। अल्लाह पाक की इबादत करें।



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