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Arafat Ki Dua: बकरीद के मौके पर जानें अराफात क्या है और इस दिन कौन सी दुआ पढ़ी जाती है
Arafat Ki Dua: अराफात (Arafat) इस्लाम धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान और अवधारणा है, जो हज (इस्लाम का पवित्र तीर्थयात्रा) के दौरान एक प्रमुख भूमिका निभाती है। अराफात एक दिन का होता है। यह इस्लामी कैलेंडर के जूल-हिज्जा महीने के नौवें दिन मनाया जाता है।
अराफात के दिन हज यात्री मक्का के पास मैदान-ए-अराफात में इकट्ठा होते हैं और दुआ करते हैं। यह दिन हज यात्रा का दूसरा दिन होता है और इसके बाद ईद-उल-अधा मनाई जाती है। आइये इस लेख के माध्यम से जानते हैं कि अराफात क्या है, इसका क्या महत्व है और इस दिन कौन सी दुआ पढ़ी जाती है:

अराफात का महत्व (Day of Arafat)
हज का प्रमुख रुक्न: अराफात का दिन, जिसे यौम-उल-अराफा (Day of Arafat) भी कहा जाता है, हज का सबसे महत्वपूर्ण दिन है। यह इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार ज़ुल-हिज्जा के 9वें दिन आता है। हज के लिए मक्का आने वाले सभी अकीदतमंदों को इस दिन अराफात के मैदान में मौजूद होना जरूरी होता है। एक हदीस के अनुसार, "हज, अराफात है" (हज अराफात के बिना अधूरा है)।
वाक़िफ़ा-ए-अराफात: (Standing at Arafat)
हज के दौरान, हाजियों (हज करने वाले) को अराफात के मैदान में दोपहर से लेकर सूर्यास्त तक रुकना पड़ता है। इसे वाक़िफ़ा-ए-अराफात (Standing at Arafat) कहते हैं। इस समय, हाजी इबादत (उपासना), तौबा (पश्चाताप), और दुआ (प्रार्थना) में करने में बिताते हैं।
माउंट अराफात (जबल-ए-रहमत): (Mount of Mercy)

अराफात के मैदान में एक पहाड़ है जिसे माउंट अराफात या जबल-ए-रहमत (Mount of Mercy) कहते हैं। इस स्थान का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। यह माना जाता है कि इसी स्थान पर पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपना आखिरी ख़ुत्बा (विदाई भाषण) दिया था।
तौबा करना:
अराफात का दिन आत्मनिरीक्षण और तौबा का दिन होता है। हाजी यहां अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं और अल्लाह से दुआ करते हैं। माना जाता है कि अराफात के दिन की दुआ और पश्चाताप अल्लाह के द्वारा विशेष रूप से स्वीकार की जाती है।
अराफात के दिन कौन सी दुआ पढ़ी जाती है (Dua on the day of Arafat)
لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٍ
"ला इलाहा इल्लल्लाहू, वाहदहू ला शरीका लहू, लहूल मुल्क वल-हूल हम्द, व-हूवा अला कुल्ली शैइन क़दीर"
अल्लाह के सिवा कोई (सच्चा माबूद) नहीं, वो अकेला है और उसका कोई शरीक नहीं, उसी के लिए सारी बादशाही है और उसी के लिए सारी तारीफ है और वो हर चीज़ पर ख़ूब क़ुदरत रखता है।
Laa ilaaha ill-allaahu, waḥdahu laa shareeka lah, lahul-mulku wa lahul-ḥamdu, wa huwa ‛alaa kulli shay'in qadeer
None has the right to be worshiped except Allah, alone, without partner. To Him belongs sovereignty and all praise and He is over all things omnipotent.
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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