Bakrid 2026: ईद उल अजहा या बकरीद पर कुर्बानी के क्या हैं नियम? जानें किन जानवरों की कुर्बानी जायज

Bakrid Qurbani Ke Niyam: ईद-उल-अजहा, जिसे बकरीद के नाम से भी जाना जाता है, इस साल 28 जुलाई, गुरुवार को मनाई जाएगी। ईद उल अजहा का त्योहार ईद उल-फितर के तकरीबन 70 दिन बाद मनाया जाता है। त्योहार को लेकर बाजारों में खूब रौनक देखने को मिल रही है और लोग खरीदारी में जुटे हैं। इस्लाम में इस पर्व का खास धार्मिक महत्व माना जाता है, क्योंकि इस दिन अल्लाह की राह में कुर्बानी दी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा हजरत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में निभाई जाती है। इस्लाम में कुर्बानी को बेहद अहम इबादत माना गया है और इसके लिए कुछ जरूरी नियम भी बताए गए हैं। इन्हीं नियमों का पालन करते हुए कुर्बानी अदा की जाती है। आइ, जानते हैं ईद उल अजहा पर कुर्बानी के क्या नियम हैं और कुर्बानी क्यों दी जाती है -

Bakrid Qurbani Niyam

कुर्बानी का असली मकसद क्या है?

ईद-उल-अजहा सिर्फ जानवर की कुर्बानी का त्योहार नहीं, बल्कि त्याग, इंसानियत और नेक नीयत का संदेश देता है। इस दिन लोग अपनी बुरी आदतों, लालच और अहंकार को छोड़ने की सीख लेते हैं। इस्लाम में जरूरतमंदों की मदद को भी खास महत्व दिया गया है। यही कारण है कि कुर्बानी का गोश्त गरीबों और रिश्तेदारों में बांटा जाता है, ताकि हर कोई त्योहार की खुशियों में शामिल हो सके।

किन लोगों पर वाजिब मानी जाती है कुर्बानी?

इस्लाम में कुर्बानी हर उस मुसलमान पर वाजिब मानी गई है, जो आर्थिक रूप से सक्षम हो। शरई भाषा में ऐसे व्यक्ति को "साहिब-ए-निसाब" कहा जाता है। यानी जिसके पास जरूरत की चीजों से अलग इतनी संपत्ति या बचत हो, जिसकी कीमत साढ़े बावन तोला चांदी के बराबर मानी जाए। अगर किसी व्यक्ति के पास नकद पैसा, सोना, चांदी या कारोबार में इतना माल मौजूद है कि उसकी कुल कीमत निसाब के बराबर पहुंचती है, तो उस पर कुर्बानी करना जरूरी माना जाता है। इस नियम का मकसद यह बताना है कि कुर्बानी उन्हीं लोगों पर वाजिब है, जो इसकी आर्थिक क्षमता रखते हों।

कुर्बानी वाजिब होने के लिए क्या शर्तें जरूरी हैं?

इस्लामिक नियमों के अनुसार किसी व्यक्ति पर कुर्बानी वाजिब होने के लिए कुछ जरूरी शर्तें बताई गई हैं। सबसे पहले व्यक्ति का बालिग होना जरूरी माना गया है। इसके साथ ही, उसका साहिब-ए-निसाब यानी आर्थिक रूप से सक्षम होना भी जरूरी है। कुर्बानी उसी व्यक्ति पर वाजिब मानी जाती है जो मुसलमान हो और ईद-उल-अजहा के दिनों में सफर पर न हो। इसके अलावा व्यक्ति का समझदार और मानसिक रूप से स्वस्थ होना भी जरूरी बताया गया है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार पागल या मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति पर कुर्बानी वाजिब नहीं होती।

ईद-उल-अजहा में किन जानवरों की कुर्बानी मान्य मानी जाती है?

इस्लाम में कुर्बानी के लिए कुछ तय जानवरों का ही जिक्र किया गया है। आमतौर पर बकरा, बकरी, भेड़, दुम्बा, गाय, बैल, भैंस और ऊंट की कुर्बानी दी जा सकती है। अलग-अलग जानवरों के लिए उम्र और हिस्सेदारी से जुड़े नियम भी बताए गए हैं, जिनका पालन करना जरूरी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक कुर्बानी का जानवर पूरी तरह स्वस्थ और सही हालत में होना चाहिए। ऐसा जानवर जो बहुत ज्यादा कमजोर हो, गंभीर बीमारी से पीड़ित हो या उसके शरीर में कोई बड़ा दोष हो, उसे कुर्बानी के लिए सही नहीं माना जाता। माना जाता है कि कुर्बानी में साफ नीयत के साथ बेहतर और सेहतमंद जानवर पेश करना अहम होता है।

कुर्बानी में हिस्सेदारी और गोश्त बांटने का क्या है तरीका?

इस्लामिक नियमों के अनुसार, छोटे जानवर जैसे बकरा, बकरी या भेड़ की कुर्बानी केवल एक व्यक्ति की तरफ से की जाती है। वहीं, बड़े जानवर जैसे ऊंट, गाय या भैंस में अधिकतम सात लोग साझेदारी कर सकते हैं। हर व्यक्ति का हिस्सा बराबर माना जाता है और सभी की नीयत कुर्बानी की होनी चाहिए। कुर्बानी के बाद गोश्त को बांटने का भी खास तरीका बताया गया है। परंपरा के मुताबिक मांस को तीन हिस्सों में बांटना बेहतर माना जाता है। पहला हिस्सा अपने घर और परिवार के लिए रखा जाता है, दूसरा रिश्तेदारों और दोस्तों को दिया जाता है, जबकि तीसरा हिस्सा जरूरतमंद और गरीब लोगों में बांटा जाता है। इस व्यवस्था के पीछे मकसद सिर्फ धार्मिक रस्म निभाना नहीं, बल्कि समाज में बराबरी और भाईचारे का संदेश देना भी है। ईद-उल-अजहा पर गरीबों तक गोश्त पहुंचाने की परंपरा इसलिए निभाई जाती है, ताकि हर व्यक्ति त्योहार की खुशी में शामिल हो सके और किसी को भी खाने-पीने की कमी महसूस न हो।

किन जानवरों की कुर्बानी नहीं मानी जाती जायज?

इस्लामिक मान्यताओं में कुर्बानी के लिए ऐसे जानवर को चुना जाना जरूरी माना गया है, जो पूरी तरह स्वस्थ और सही हालत में हो। जो जानवर बहुत ज्यादा बीमार, कमजोर, अंधा, लंगड़ा या गंभीर चोट से परेशान हो, उसकी कुर्बानी उचित नहीं मानी जाती। माना जाता है कि कुर्बानी सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि अल्लाह के प्रति सच्ची नीयत और समर्पण का प्रतीक है, इसलिए जानवर में बड़ी शारीरिक कमी नहीं होनी चाहिए।

कुर्बानी के जानवर की उम्र को लेकर क्या हैं नियम?

कुर्बानी के लिए हर जानवर की न्यूनतम उम्र तय बताई गई है। बकरा और बकरी कम से कम एक साल के होने चाहिए, जबकि भेड़ या दुम्बा छह महीने का हो सकता है, अगर उसका शरीर अच्छी तरह विकसित हो। वहीं गाय, बैल और भैंस के लिए दो साल की उम्र जरूरी मानी जाती है। ऊंट की कुर्बानी के लिए उसकी उम्र कम से कम पांच साल होना जरूरी बताया गया है। यही वजह है कि जानवर खरीदते समय उसकी सेहत के साथ उम्र की सही जानकारी लेना भी बेहद अहम माना जाता है।

Story first published: Wednesday, May 27, 2026, 13:44 [IST]
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