हरतालिका तीज व्रत कथा: जब नारद मुनि विष्णु विवाह का प्रस्ताव लेकर पहुंचे, मां पार्वती हुईं हैरान

हरतालिका तीज व्रत का पूर्ण फल तभी मिलता है जब पूजा के अंत में इसकी कथा सुनी या पढ़ी जाए। यह कथा माता पार्वती की उस कठोर तपस्या की गाथा है, जो उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए की थी। आइए जानते हैं यह पावन कथा।

Hartalika Teej Vrat Katha
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कथा का आरंभ
एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा, "हे प्रभु, आपने मुझे पति रूप में कैसे प्राप्त किया? कृपया मुझे वह कथा सुनाइए, जिसे सुनकर स्त्रियां अखंड सौभाग्य प्राप्त कर सकें।" भगवान शिव मुस्कुराए और उन्हें अपने पूर्व जन्म की यह कथा सुनाने लगे। शिवजी ने बताया कि पूर्व जन्म में पार्वती हिमालय राज की पुत्री थीं। बचपन से ही उन्होंने मन में यह ठान लिया था कि वे भगवान शिव को ही अपना पति बनाएंगी और इसके लिए उन्होंने बाल्यकाल से ही कठोर तप करना शुरू कर दिया था। वे निराहार रहकर, कभी पत्ते खाकर तो कभी केवल वायु पीकर वर्षों तक शिवजी की आराधना करती रहीं।

नारद मुनि का आगमन और विष्णु विवाह का प्रस्ताव
एक दिन नारद मुनि हिमालय राज के पास पहुंचे और उनसे कहा कि भगवान विष्णु स्वयं पार्वती से विवाह करना चाहते हैं, इसलिए उनका विवाह भगवान विष्णु के साथ कर देना चाहिए। हिमालय राज यह सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने बिना पार्वती की इच्छा जाने ही इस विवाह के लिए हामी भर दी। जब यह बात पार्वती को पता चली, तो वे बहुत दुखी हुईं। उनका मन तो केवल भगवान शिव को समर्पित था, वे किसी और से विवाह करने की कल्पना भी नहीं कर सकती थीं। रोते हुए उन्होंने अपनी सखी को अपना यह दुख बताया और उनसे सहायता मांगी।

सखी का साथ और घने वन में तपस्या
पार्वती की प्रिय सखी उन्हें समझ गई और उसने पार्वती को इस विवाह से बचाने का निश्चय किया। वह पार्वती को चुपचाप घने जंगल में एक गुफा में ले गई, जहां किसी की नजर उन तक न पहुंच सके। चूंकि सखी उन्हें हर लेकर ले गई थी, इसलिए इस व्रत का नाम "हरितालिका" पड़ा, "हरित" यानी हरण करना और "आलिका" यानी सखी।

घने जंगल की उस गुफा में पार्वती ने रेत और मिट्टी से भगवान शिव की एक प्रतिमा बनाई और उसी की पूजा-अर्चना करने लगीं। उन्होंने अन्न-जल का त्याग कर कठोर व्रत रखा और दिन-रात शिवजी का ध्यान करती रहीं। उनकी इस अटूट भक्ति और तपस्या को देखकर स्वयं भगवान शिव प्रसन्न हो गए और उन्हें दर्शन देकर वर मांगने को कहा।

शिवजी का वरदान और विवाह
पार्वती ने भगवान शिव से यही वरदान मांगा कि वे उन्हें ही अपना पति स्वीकार करें। शिवजी ने पार्वती की भक्ति और तप से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वचन दिया। इसके बाद विधिवत रूप से भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। इस प्रकार माता पार्वती की कठोर तपस्या और अडिग श्रद्धा से उन्हें भगवान शिव पति रूप में प्राप्त हुए। तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि जो भी स्त्री भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन विधिपूर्वक हरितालिका तीज का व्रत रखती है और यह कथा सुनती है, उसे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और कुंवारी कन्याओं को मनचाहा वर मिलता है।

Story first published: Monday, September 14, 2026, 13:44 [IST]
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