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जब बाबा को ट्रेन से उतारा तो वहीं रुक गई रेल! नीम करोली बाबा के चमत्कार की कहानी, जिसने अंग्रेजों को झुकाया
Neem Karoli Baba Train Miracle: बीसवीं सदी के महान संतों में शुमार और दिव्य शक्तियों के धनी नीम करोली बाबा को आज किसी परिचय की जरूरत नहीं है। एप्पल के स्टीव जॉब्स से लेकर फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग तक, दुनिया की दिग्गज हस्तियां उनके दर पर शीश झुका चुकी हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब बाबा को लोग 'लक्ष्मण दास' के नाम से जानते थे? उन्हें 'नीम करोली बाबा' नाम ब्रिटिश काल में हुए एक ऐसे विस्मयकारी रेल चमत्कार के बाद मिला, जिसने अंग्रेज अधिकारियों के होश उड़ा दिए थे। जब एक अंग्रेज टीटीई ने बाबा को बिना टिकट देखकर जबरन ट्रेन से नीचे उतार दिया, तो उस ट्रेन ने भी आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। रेलवे का पूरा अमला हैरान रह गया और आखिरकार अंग्रेजी हुकूमत को बाबा के सामने घुटने टेकने पड़े। आइए जानते हैं क्या थी वह ऐतिहासिक घटना और कैसे पड़ा बाबा का यह चमत्कारी नाम।

बिना टिकट सफर और वो अंग्रेज टीटीई: जब बाबा को बीच रास्ते में उतारा गया
यह घटना ब्रिटिश काल की है, जब बाबा महाराज साधु लक्ष्मण दास फर्गुखाबाद के पास स्थित 'नीम करोली' (Neem Karoli) नामक गांव के रेलवे स्टेशन से गुजरने वाली एक ट्रेन में सवार हुए थे। बाबा बिना टिकट ट्रेन के फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट में बैठ गए। कुछ दूर जाने के बाद जब अंग्रेज टीटीई (Ticket Examiner) टिकट चेक करने आया, तो उसने एक साधारण से दिखने वाले साधु को वहां बैठे देखा। बाबा के पास टिकट न होने पर अंग्रेज टीटीई बेहद नाराज हुआ और उसने बदतमीजी करते हुए बाबा को अगले स्टेशन 'नीम करोली' पर ट्रेन से नीचे उतार दिया। बाबा बिना कुछ कहे शांति से मुस्कुराते हुए ट्रेन से उतरे और पास ही के एक पेड़ के नीचे अपना चीमटा गाड़कर बैठ गए।
ड्राइवरों ने लगा दिया पूरा जोर, पर टस से मस न हुई ट्रेन
अब बाबा तो ट्रेन से उतर गए लेकिन असली कौतूहल और चमत्कार तब शुरू हुआ जब टीटीई के हरी झंडी दिखाने के बाद ड्राइवर ने ट्रेन आगे बढ़ाने के लिए इंजन चालू किया लेकिन वो एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी। ड्राइवर ने ट्रेन चलाने के लिए पूरा जोर लगा दिया, प्रेशर फुल था, इंजन से पूरी ताकत लगाई गई, लेकिन ट्रेन का एक भी पहिया अपनी जगह से आगे नहीं हिला। ट्रेन में खराबी की आशंका के चलते रेलवे के इंजीनियरों और मैकेनिक्स को बुलाया गया। पूरी जांच की गई, लेकिन इंजन और बोगियों में कोई भी तकनीकी खराबी नहीं मिली। ट्रेन स्टेशन पर ही पूरी तरह लॉक हो चुकी थी।
यात्रियों का फूटा गुस्सा, जब अंग्रेज अधिकारियों को समझ आई बाबा की महिमा
ट्रेन के घंटों खड़े रहने के कारण यात्री परेशान होने लगे। तभी ट्रेन में मौजूद कुछ भारतीय यात्रियों, जो बाबा की आध्यात्मिक क्षमता को जानते थे, उन्होंने अंग्रेज अधिकारियों को पूरी बात बताई। यात्रियों ने कहा कि आपने जिस दिव्य संत को अपमानित करके ट्रेन से नीचे उतारा है, यह उसी का नतीजा है। जब तक आप उनसे माफी मांगकर उन्हें ससम्मान वापस ट्रेन में नहीं बिठाते, यह ट्रेन एक इंच भी आगे नहीं बढ़ेगी। शुरुआत में अंग्रेज अधिकारियों ने इस बात को अंधविश्वास माना, लेकिन जब हर कोशिश नाकाम हो गई, तो मजबूरन टीटीई और स्टेशन मास्टर उस पेड़ के नीचे गए जहां बाबा बैठे थे। अधिकारियों ने बाबा से अपनी गलती के लिए हाथ जोड़कर माफी मांगी।

जब बाबा ने रखी रेलवे के सामने शर्त और दौड़ पड़ी ट्रेन
अंग्रेज अधिकारियों के बार-बार अनुनय-विनय करने पर बाबा ने मुस्कुराते हुए ट्रेन में वापस बैठने के लिए हामी भरी, लेकिन उन्होंने ब्रिटिश रेलवे के सामने दो बेहद जरूरी शर्तें रख दीं-
बाबा की शर्त: बाबा ने कहा कि वह ट्रेन में तभी बैठेंगे जब रेलवे प्रशासन इस 'नीम करोली' गांव में एक पक्का रेलवे स्टेशन बनवाएगा और इलाके के गरीब साधु-संतों को परेशान करना बंद करेगा। अंग्रेज अधिकारियों ने तुरंत बाबा की सभी शर्तें मान लीं। जैसे ही बाबा महाराज ने ट्रेन के डिब्बे में अपने कदम रखे, ड्राइवर ने बिना किसी प्रयास के ट्रेन चालू की और ट्रेन तुरंत आगे दौड़ पड़ी।
इस घटना के बाद 'लक्ष्मण दास' ऐसे बन गए 'नीम करोली बाबा'
इस ऐतिहासिक और चमत्कारी घटना ने बाबा को रातों-रात पूरे इलाके में प्रसिद्ध कर दिया। क्योंकि यह चमत्कार 'नीम करोली' नामक गांव के स्टेशन पर हुआ था और बाबा ने इसी गांव के उद्धार के लिए अंग्रेजों से वादा लिया था, इसलिए वहां के स्थानीय लोगों और रेलवे स्टाफ ने उन्हें 'नीम करोली बाबा' पुकारना शुरू कर दिया। बाद में बाबा ने इसी गांव में एक गुफा बनाकर कुछ समय तक कठिन साधना भी की थी। आज भी यह रेलवे स्टेशन बाबा के इस महान चमत्कार की गवाही देता है।



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