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Niladri Bije: रथयात्रा के समापन पर जानें क्यों जगन्नाथ जी लक्ष्मी जी के लिए लाते हैं रसगुल्ला
Niladri Bije or Rasgulla Diwas: उस वक्त भक्तों के चेहरे पर ख़ुशी और मायूसी का अजीब संगम देखने को मिलता है जब भव्य जगन्नाथ रथ यात्रा अपने समापन के नजदीक पहुंचती है।
आषाढ़ महीने की द्वितीया तिथि को प्रारंभ हुए जगन्नाथ यात्रा का समापन नीलाद्रि बिजे रस्म के साथ होता है। यह अनुष्ठान भगवान जगन्नाथ के वापस अपने गर्भ गृह में जाने का प्रतीक है, जहां वो अपनी पत्नी महालक्ष्मी को मनाते हैं।

नीलाद्रि बिजे की रस्म को रसगुल्ला दिवस के नाम से भी जाना जाता है। यह भगवान जगन्नाथ और उनकी पत्नी महालक्ष्मी के बीच प्यार से रूठने-मनाने रिश्ते को दर्शाती है। आइये जानते हैं नीलाद्रि बिजे किस तरह मनाया जाता है और इसे रसगुल्ला दिवस क्यों कहा जाता है।
जगन्नाथ रथ यात्रा की अंतिम रस्म है नीलाद्रि बिजे
भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ नगर भ्रमण करके और गुंडिचा मंदिर में विश्राम के बाद वापस अपने निवास पुरी लौटते हैं। रथ यात्रा उत्सव के अंतिम दिन विशेष अनुष्ठान होता है जिसे नीलाद्रि बिजे कहा जाता है। दरअसल जगन्नाथ जी के पुरी निवास स्थान को नीलाचल या नीलाद्री के रूप में जाना जाता है।

यह रस्म भगवान जगन्नाथ जी के गर्भगृह में वापसी को चिह्नित करता है। इस रस्म में जगन्नाथ जी अपने भाई- रथों से पहण्डी अनुष्ठान के साथ श्रीमंदिर में लौटते हैं। इसमें तीनों पवित्र मूर्तियों को रथ से गर्भगृह में ले जाता जाता है।
नीलाद्रि बीजे अनुष्ठान कैसे होता है?
नीलाद्रि बीजे के मौके पर देवताओं को संध्या धूप अर्पित की जाती है। इसके बाद तलध्वज, नंदीघोष और दर्पदलन रथों पर सभी देवताओं को पुष्प प्रसाद अर्पित किया जाता है। फिर "दोरालागी" अनुष्ठान किया जाता है।
सबसे पहले, भगवान सुदर्शन, फिर भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की पहंडी होती है। सबसे अंत में, जगत के पालनहार स्वामी जगन्नाथ की पहंडी शुरू होती है।
जगन्नाथ रथ यात्रा में रसगुल्ला दिवस क्या है?

ये हम सभी को मालूम है कि भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ निकल जाते हैं और इस बात की जानकारी जब उनकी पत्नी महालक्ष्मी को होती है तब उनका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ जाता है। यह गुस्सा तब भी बना रहता है जब जगन्नाथ जी दस दिन की यात्रा के बाद अपने निवास पर पहुंचते हैं। माता लक्ष्मी रुष्ट होने के कारण जय-बिजय द्वार बंद कर देती हैं।
अपनी रूठी पत्नी को मनाने लिए के मनमोहने भगवान जगन्नाथ जी रसगुल्ले का सहारा लेते हैं। गुस्सा शांत करने के लिए जगन्नाथ जी उपहार स्वरूप माता लक्ष्मी को रसगुल्ले देते हैं और यह वादा करते हैं कि वो फिर ऐसी गलती नहीं दोहराएंगे।
स्थानीय लोग भी खाते हैं रसगुल्ले

भगवान जगन्नाथ जी की यात्रा सम्पन्न होने के बाद श्रद्धालु अगले साल फिर उनसे जल्दी पधारने की गुजारिश करते हैं। लोग अपने भगवान को विदा करते हैं। समापन दिवस पर कई घरों में भी रसगुल्ला दिवस मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि रसगुल्ला रिश्तों में मिठास घोलता है इसलिए घरों में रसगुल्ला लाया परिवार के साथ खाया जाता है।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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