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Jivitputrika Vrat 2023:संतान की दीर्घायु के लिए रखा जाता है जितिया व्रत, देखें तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि, मंत्र
Jivitputrika Vrat 2023 Kab Hai: हिन्दू धर्म में व्रत-त्योहारों का ख़ास महत्व होता है। इस संस्कृति में संतान की बेहतरी के लिए भी कई तरह के व्रत रखे जाते हैं। इनमें से ही एक है जितिया व्रत जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है।
विवाहित स्त्रियों द्वारा रखे जाने वाले इस व्रत से संतान को दीर्घायु प्राप्त होती है। नवविवाहित महिलाओं द्वारा इस व्रत को रखे जाने से संतान प्राप्ति का सुख भी प्राप्त होता है। यह व्रत 3 दिनों तक चलता है जिसकी शुरुआत नहाए खाए की रीत के साथ होती है। जानते हैं इस वर्ष जीवित्पुत्रिका का पर्व कब मनाया जायेगा और पूजन विधि -

जितिया व्रत 2023 की तिथि एवं मुहूर्त (Jitiya Vrat 2023 Date and Muhurat)
इस वर्ष जीवित्पुत्रिका पर्व की शुरुआत 5 अक्टूबर से हो जायेगी। 5 तारीख को नहाए खाय से इस पर्व की शुरुआत होगी, 6 अक्टूबर को जितिया व्रत रखा जाएगा और अगले दिन यानि 7 अक्टूबर को व्रत का पारण किया जाएगा।
जितिया व्रत के दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:46 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक है। वहीं, राहुकाल सुबह 10:41 बजे से लेकर दोपहर 12:29 बजे तक है। इस दौरान कोई भी शुभ काम करने की मनाही होती है।
जितिया व्रत की पूजा विधि (Jitiya Vrat Puja Vidhi)

जितिया व्रत के दिन सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इस व्रत के दिन भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। जीमूतवाहन भगवान की प्रतिमा के सामने धूप-दीप, चावल और फूल अर्पित किए जाते हैं। इसके साथ ही गोबर और मिट्टी से चील और सियारिन की मूर्ति बनाई जाती है और उनकी पूजा करते हुए माथे पर सिन्दूर लगाते हैं। साथ ही जितिया व्रत कथा सुनते हैं और विशेष मन्त्र का जाप करते हैं।
जितिया व्रत मंत्र (Jitiya Vrat Mantra)
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा बसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि।।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते,
देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः
जितिया व्रत का महत्व (Importance of Jitiya Vrat)
सनातन हिन्दू धर्म में जितिया व्रत का खासा महत्व है। इससे संतान की दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वहीं कई महिलाओं को इस व्रत के पालन से संतान का सुख प्राप्त होता है। धार्मिक मानयाताओं के अनुसार महाभारत के युद्ध के दौरान अश्वत्थामा ने अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रही संतान को मार दिया था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी शक्तियों से एकबार फिर उस संतान को जीवित कर दिया। जन्म के बाद इसी पुत्र का नाम जीवित्पुत्रिका रखा गया था और तभी से इस व्रत को रखने की परम्परा शुरू हुई। जीवित्पुत्रिका व्रत को रखने से श्री कृष्ण की सुरक्षा संतान को प्राप्त होती है।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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