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Vat Savitri Vrat में पानी पी सकते हैं या नहीं? जानें क्या कहते हैं नियम और शास्त्र, किन्हें होती है छूट
Can we drink water in Vat Savitri Vrat: हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत को अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन का प्रतीक माना जाता है। ज्येष्ठ अमावस्या के दिन रखा जाने वाला यह पावन व्रत साल 2026 में 16 मई, शनिवार को मनाया जाएगा। इस दिन सुहागिन महिलाएं माता सावित्री और सत्यवान की कथा सुनकर बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं और अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। हालांकि हर साल महिलाओं के मन में एक सवाल जरूर उठता है कि क्या वट सावित्री व्रत में पानी पी सकते हैं या यह पूरी तरह निर्जला व्रत होता है? शास्त्रों के अनुसार यह व्रत मुख्य रूप से निर्जला माना गया है, लेकिन स्वास्थ्य, गर्भावस्था और उम्र जैसी परिस्थितियों में कुछ विशेष छूट भी बताई गई हैं। ऐसे में आइए जानते हैं वट सावित्री व्रत में पानी पीने के नियम, पारण का सही समय और किन महिलाओं को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

क्या वट सावित्री व्रत निर्जला होता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वट सावित्री व्रत पारंपरिक रूप से निर्जला रखा जाता है। यानी व्रत रखने वाली महिलाएं सूर्योदय से लेकर पूजा और पारण तक अन्न और जल दोनों का त्याग करती हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और पति की आयु में वृद्धि होती है। हालांकि, कई क्षेत्रों में फलाहार और जल ग्रहण करने की परंपरा भी देखने को मिलती है। इसलिए व्रत के नियम परिवार की परंपरा और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार भी निभाए जाते हैं।
क्या वट सावित्री व्रत में पानी पी सकते हैं?
शास्त्रों के अनुसार स्वस्थ महिलाएं यदि सक्षम हों तो निर्जला व्रत रख सकती हैं। लेकिन यदि किसी महिला को कमजोरी लगे या वो बीमार हो और दवाई खाती हो तो वो पानी पी सकती है। इसके अलावा गर्भवती महिलाएं और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को भी वट सावित्री व्रत में पानी पीने की छूट होती है। ऐसी स्थिति में पानी पीना या फलाहार करना दोषपूर्ण नहीं माना जाता। धर्म में स्वास्थ्य को सबसे बड़ा धर्म कहा गया है, इसलिए अपनी क्षमता से अधिक कठिन व्रत करना उचित नहीं माना जाता।
गर्भवती महिलाएं कैसे रखें वट सावित्री व्रत?
यदि कोई महिला प्रेग्नेंट है, तो उसे निर्जला व्रत रखने से बचना चाहिए। ज्योतिष और धर्माचार्यों के अनुसार गर्भवती महिलाएं फलाहार कर सकती हैं वो नारियल पानी या साधारण पानी पी सकती हैं इसके अलावा गर्भ में पल रहे शिशु की सेहत का ध्यान रखते हुए दूध और फल ले सकती हैं और मानसिक रूप से पूजा और कथा सुन सकती हैं। ऐसा करने से व्रत का पुण्य कम नहीं होता, क्योंकि भाव और श्रद्धा सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।
वट सावित्री व्रत में पानी कब पीना चाहिए?
अगर आप निर्जला व्रत रख रही हैं, तो पूजा और व्रत पारण के बाद ही जल ग्रहण करना चाहिए। सामान्यत बरगद की पूजा करने व कथा सुनने के बाद ही पानी पीना चाहिए। इसते अलाला वट वृक्ष की सात या 11 परिक्रमा करें, पति का आशीर्वाद लें और दान-पुण्य करें फिर जल ग्रहण करें।
वट सावित्री व्रत का पारण कैसे करें?
व्रत का पारण शांत मन और श्रद्धा से करना चाहिए। पारण के समय सबसे पहले भगवान और माता सावित्री का स्मरण करें, जल ग्रहण करें और मीठा खाकर व्रत खोलें। सास या बड़ों का आशीर्वाद लें और उन्हें बायना दें और फिर खुद भोजन करें। मान्यता है कि इससे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
वट सावित्री व्रत का असली महत्व क्या है?
वट सावित्री व्रत केवल निर्जला रहने का नाम नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, समर्पण और वैवाहिक रिश्ते की मजबूती का पर्व है। शास्त्रों में भावना और श्रद्धा को सबसे अधिक महत्व दिया गया है। इसलिए यदि स्वास्थ्य कारणों से पानी पीना पड़े, तो मन में अपराधबोध नहीं रखना चाहिए। सच्ची श्रद्धा और सकारात्मक भाव से किया गया व्रत ही सबसे अधिक फलदायी माना जाता है।



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