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Kamada Ekadashi Ki Katha: श्रीहरि विष्णु की कृपा पाने के लिए आज जरूर करें कामदा एकादशी कथा का पाठ
Kamada Ekadashi Ki Katha: कामदा एकादशी के पावन पर्व पर भगवान विष्णु की विधि विधान से पूजा अर्चना की जाती है। कामदा एकादशी का व्रत संपूर्ण मनोकामनाओं को पूर्ण करता है। जो भी व्यक्ति सच्चे मन तथा श्रद्धा के साथ कामदा एकादशी का व्रत रखता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उनके ऊपर भगवान विष्णु की असीम कृपा बनी रहती है। कामदा एकादशी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन व्रत रखने वाले उपासक को अनिवार्य रूप से व्रत की कथा पढ़नी चाहिए।
कामदा एकादशी की कथा (Kamada Ekadashi Ki Katha)

भगवान श्री कृष्ण ने कामदा एकादशी व्रत की कथा पांडु पुत्र युधिष्ठिर को विस्तार पूर्वक सुनाई थी। इसके पूर्व वरिष्ठ मुनि ने भी राजा दिलीप को इस व्रत की महिमा सुनाई थी। आइए जानते हैं इसे। कामदा एकादशी व्रत की कथा के अनुसार प्राचीन काल में पुंडरीक नामक राजा भोगीपुर नगर पर राज करता था। उस नगर में बहुत से किन्नर, अप्सरा तथा गंधर्व रहते थे। राजा का दरबार इन लोगों से हमेशा भरा रहता था। दरबार में मनोरंजन के लिए हर दिन हर समय गंधर्वों तथा किन्नरों का गायन हुआ करता था। उसी नगर में एक बहुत ही खूबसूरत ललिता नामक अप्सरा अपने पति श्रेष्ठ गंधर्व के साथ निवास करती थी। दोनों के मध्य बहुत प्रेम था वह एक दूसरे की यादों में हमेशा खोए रहते थे।
कुछ समय बाद एक बार राजा के दरबार में ललित गंधर्व गायन कर रहे थे। और उसे अपने धर्म पत्नी ललिता की याद आ गई। इसी कारण उनका स्वर अनियंत्रित हो गया और वह बेसुरा होकर गाने लगे। इस बात को एक करकट नामक नाग समझ गया तथा उसी समय जाकर राजा पुंडरीक के कानों में पूरी बात बता दी। यह सुनते ही राजा बहुत ही क्रोधित हुए और ललित गंधर्व को श्राप दे दिया। ललित गंधर्व ने श्राप के कारण एक राक्षस का रूप ले लिया। इसके पश्चात गंधर्व ललित लंबे समय तक राक्षस योनि में घूमता रहा और उनकी धर्मपत्नी ललिता उनका अनुसरण करती रही। लेकिन वह अपने पति के हालात देखकर बहुत दुखी रहती थी।
कुछ वर्षों के पश्चात भटकते भटकते ललिता अपने पति को विंध्य पर्वत पर ऋषि मुख के पास लेकर गई। वह ऋषि से अपने पति के श्राप के उद्धार के बारे में उपाय पूछने लगी। ऋषि को उनके ऊपर बीती कहानी को सुनकर बहुत ही दया आई और उनकी मदद करने के लिए ऋषि ने ललिता गंधर्व को कामदा एकादशी व्रत रखने को कहा। फिर ऋषि का आशीर्वाद प्राप्त करके गंधर्व अपने निज निवास पर वापस आई और श्रद्धा पूर्वक तथा सच्चे मन के साथ कामदा एकादशी का व्रत किया। इस एकादशी के व्रत से ललित गंधर्व श्राप से मुक्त हो गया। फिर दोनों को पुनर्जन्म मिल गया और हँसी-खुशी अपना जीवन यापन करने लगे।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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