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नागा साधु की वेशभूषा में छिपा है रहस्य! जानिये क्यों रखते हैं जटा, भस्म, चिमटा और त्रिशूल
नागा सिर्फ साधु ही नहीं होते, ये योद्धा भी होते हैं जिनका एक काम धर्म की रक्षा करना भी है। अपनी जीवन शैली और कठिन ब्रह्मचर्य के पालन के कारण ये बहुत बलशाली होते हैं।
वैसे तो साधुओं की भिन्न भिन्न वेशभूषा देख के आश्चर्य होता है किन्तु जिन्हें मालूम है वो साधू की वेशभूषा देख कर ही समझ लेते हैं कि ये किस प्रकार के साधु हैं।

अगर हम ख़ासतौर पर नागा साधुओं की बात करें तो इनकी वेशभूषा को देखकर ही कई सवाल जेहन में कौंध जाते हैं। जैसे ये जटा क्यों रखते हैं? चिमटा और त्रिशूल क्यों रखते हैं? भस्म क्यों लगाए रहते हैं? गले में क्यों पहनते हैं? आइये आपको बताते हैं कि इस विशेष वेशभूषा के पीछे क्या कारण है?
भस्म
नागा बाबा अपने शारीर पर भस्म लगाए दिख जाते हैं। आमतौर पर भस्म लगाए साधू शिव के भक्त होते हैं। इसके पीछे धार्मिक कारण ये है कि शिव कैलाश पर्वत पर विराजमान हैं और ठण्ड से अपने शरीर की रक्षा के लिए भस्म लगाते हैं। नागा अपने इष्टदेव का अनुसरण करते हुए ही भस्म लगाते हैं।
इसका वैज्ञानिक कारण ये है कि भस्म त्वचा के रोम छिद्रों को बंद कर देता है जिससे तापमान में वृद्धि या कमी का ज्यादा असर नहीं पड़ता है। ये भस्म कपड़े की तरह काम करता है। इसलिए नागा साधु नहाने के बाद भस्म जरुर लगाते हैं।
चिमटा और त्रिशूल
जैसा की ऊपर बताया गया, नागा सिर्फ साधु ही नहीं योद्धा भी होते हैं। धर्म की रक्षा करना भी इनकी एक जिम्मेदारी है। ऐसे में वो चिमटा और त्रिशूल को शस्त्र की तरह अपने साथ रखते हैं। कुछ साधु तो अपने साथ फरसा भी रखते हैं। साधू जहां अपना डेरा डालते हैं, वहां वो आग जला लेते हैं जिसको धुनि रमाना बोला जाता है। इनके पास ऐसी तरकीब होती है कि ये गीली लकड़ी में भी आग लगा देते हैं। इन कामों में चिमटा बहुत उपयोगी होता है।
कुछ साधु तो चिमटे से ही आशीर्वाद भी देते हैं। जंगली जानवरों से खुद की रक्षा करने में त्रिशूल काम आता है। त्रिशूल शिव प्रिय शस्त्र है जिससे नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं। यही कारण है कि साधु अपने साथ चिमटा और त्रिशूल रखते हैं।
रुद्राक्ष की माला
साधु मोह माया की चीजो और ऐशो आराम की चीजो से दूर रहते हैं इसलिए कीमती रत्न नहीं पहनते हैं। ये रुद्राक्ष पहनते हैं। ऐसा कहा जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति शिव के आंसू से हुई है। शिव को रुद्राक्ष बहुत प्रिय है। इसलिए शिव भक्त नागा साधु अपने गले और कलाई में रुद्राक्ष धारण करते हैं।
रुद्राक्ष एक्यूप्रेशर का काम भी करता है। ये गर्दन के नसों पर दबाव डालता है जिससे रक्त चाप नियंत्रण में मदद मिलती है। साधु किसी भी तरह के तापमान में अपने को अनुकूलित कर लेते हैं। ऐसे में रुद्राक्ष का मेडिकल गुण मददगार होता है। धार्मिक मत के अनुसार साधु की ध्यान साधना से रुद्राक्ष सिद्ध हो जाता है और इसमें शक्ति आ जाती है। इसलिए कई बार जब साधु बहुत प्रसन्न होते हैं तो भक्त को रुद्राक्ष आशीर्वाद के रूप में भी देते हैं।
तिलक
साधु तिलक लगाने के मामले में बहुत गंभीर होते हैं। ये नहाने के बाद बड़ी तल्लीनता से तिलक लगाते हैं। ये तिलक इनकी पहचान होती है। ये कोशिश करते हैं कि हर दिन एक जैसा तिलक लगाया जाए हालांकि अलग अलग अवसरों पर तिलक का डिजाइन बदल भी सकता है। तिलक लगाने के पीछे कारण ये है कि हमारे मस्तिष्क के बीच में एक आज्ञाचक्र होता है जिसे गुरुचक्र भी कहते हैं। गुरु चक्र इसलिए कहते हैं क्योंकि ये देवताओं के गुरु बृहस्पति का स्थान होता है। गुरु एकाग्रता लाने और ज्ञान जागृत करने में सहायक होते हैं।
साधु लोग तपस्वी भी होते हैं जो साधना करके दैवीय ज्ञान पाना चाहते हैं। इसलिए ये गुरुचक्र को जागृत रखने के लिए उस जगह तिलक लगाते हैं। ये गुरु के प्रति सम्मान प्रकट करने का भी भाव है।
जटा
साधुओं की एक पहचान होती है उनकी जटा। उलझे हुए लम्बे बाल को लपेट कर बांध लेते हैं या फिर खुला रखते हैं। दरअसल इसके पीछे कई कारण हैं लेकिन जो सबसे तार्किक कारण है वो ये कि जटा भौतिक शारीर से अलग होने की मंशा की पहचान है। साधु मोक्ष पाना चाहते हैं और इसीलिए वो तपस्या और साधना करते हैं। ऐसे में वो ऐसे कार्य में ज्यादा समय नहीं देते जिससे साधना का समय कम पड़ जाए। बाल को संवारना और कंघी करना इन्हें पसंद नहीं क्योंकि ये प्रकृति में विश्वास रखते हैं और बाल की प्रकृति है बढ़ना सो बढ़ने देते हैं।
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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