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Papmochani Ekadashi Vrat Katha: पापमोचनी एकादशी पर पढ़ें ये व्रत कथा, सभी पापों का होगा नाश और मिलेगी मुक्ति
Papmochani Ekadashi Vrat Katha: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व है। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी कहा जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, इस साल यह एकादशी 15 मार्च 2026, रविवार को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत रखने और विधिवत पूजा-पाठ करने से सभी पापों नष्ट हो जाते हैं। साथ ही, भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है। इस दिन पूजा करने के बाद पापमोचनी एकादशी व्रत की कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत कथा का पाठ करने से साधक सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। तो आइए, जानते हैं पापमोचनी एकादशी की व्रत कथा -

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा
एक बार राजा मांधाता ने महर्षि लोमश से प्रश्न किया कि कि चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी कौन सी होती है? उसकी क्या विधि है तथा उससे किस फलकी प्राप्ति होती है? तब महर्षि लोमश ने कहा - चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम पापमोचनी एकादशी है। उसके व्रत के प्रभाव से मनुष्यों के अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं। मैं तुम्हें इस व्रत की कथा सुनाता हूँ।
लोमशजी ने कहा- प्राचीन समय में चैत्ररथ नाम का एक सुन्दर वन था। उस वन में हमेशा वसंत ऋतु का वातावरण रहता था और चारों ओर तरह-तरह के पुष्प खिले रहते थे। वहां अप्सराएं, किन्नर और गंधर्व आनंदपूर्वक विहार करते थे। कभी गंधर्व कन्याएं वहां घूमती थीं, तो कभी देवराज इंद्र अन्य देवताओं के साथ वहां क्रीड़ा करते थे। उसी वन में मेधावी नाम के एक तपस्वी ऋषि कठोर तपस्या किया करते थे। वे भगवान शिव के परम भक्त थे। एक दिन मंजुघोषा नाम की एक सुंदर अप्सरा वहां आई। उसने ऋषि को मोहित करने का विचार किया। वह कुछ दूरी पर बैठकर वीणा बजाने लगी और मधुर स्वर में गाना गाने लगी। उसी समय कामदेव भी ऋषि की तपस्या भंग करने का प्रयास करने लगे। कामदेव ने अप्सरा की भौंहों को धनुष और उसकी चितवन को प्रत्यंचा के समान मानकर अपने प्रभाव से वातावरण को मोहक बना दिया। उस समय मेधावी ऋषि भी युवा थे। मंजुघोषा का मधुर संगीत और उसका सौंदर्य देखकर उनका मन विचलित हो गया। धीरे-धीरे वे उसके आकर्षण में पड़ गए और कामभावना के वशीभूत होकर उसके साथ रहने लगे।
इस मोह में पड़कर ऋषि समय का भान भी भूल गए। दिन-रात का उन्हें कोई ज्ञान नहीं रहा और वे दोनों लंबे समय तक साथ रहते रहे। काफी समय बीत जाने के बाद मंजुघोषा ने ऋषि से कहा, "हे ऋषिवर! मुझे अब स्वर्ग लौटने की अनुमति दीजिए, मुझे यहां बहुत समय हो गया है।" ऋषि ने उससे कहा, "तुम अभी-अभी तो आई हो, थोड़ी देर और ठहरो, प्रातः होने पर चली जाना।" इसी प्रकार समय बीतता गया। जब अप्सरा ने फिर जाने की बात कही, तब भी ऋषि ने उसे रोक लिया। अंततः अप्सरा ने कहा, "हे मुनिवर! आपकी एक रात ही बहुत लंबी प्रतीत होती है। कृपया विचार कीजिए कि मुझे आपके पास आए कितना समय हो चुका है।"
अप्सरा की बात सुनकर ऋषि को समय का ध्यान आया। जब उन्होंने विचार किया तो उन्हें ज्ञात हुआ कि इस भोग-विलास में 57 वर्ष बीत चुके हैं। यह जानकर उन्हें अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने इसे अपने तप का नाश मान लिया। क्रोध से भरे हुए मेधावी ऋषि ने अप्सरा से कहा, "तूने मेरी तपस्या भंग की है। तू पापिनी है, इसलिए मेरे श्राप से पिशाचिनी बन जा।" ऋषि के श्राप से मंजुघोषा तुरंत पिशाचिनी बन गई। यह देखकर वह अत्यंत दुखी हुई और विनम्र होकर बोली, "हे मुनिवर! कृपा करके मेरे श्राप से मुक्ति का मार्ग बताइए। इतने वर्षों तक आपके साथ रहने के बाद यदि मुझे ऐसा दंड मिला तो लोग भी यही कहेंगे कि साधु संगति का फल बुरा मिला।" उसकी बात सुनकर ऋषि को अपने क्रोध पर पछतावा हुआ। तब उन्होंने कहा, "चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी आती है, उसे पापमोचनी एकादशी कहते हैं। यदि तुम उस दिन श्रद्धा और विधि से व्रत करोगी तो इस पिशाचिनी रूप से मुक्त हो जाओगी।"
इसके बाद मेधावी ऋषि अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गए और उन्हें सारी घटना बताई। च्यवन ऋषि ने कहा, "पुत्र! तुमने जो भूल की है, उसका प्रायश्चित पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से हो सकता है। श्रद्धा और नियम से यह व्रत करो, इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।" पिता के आदेश का पालन करते हुए मेधावी ऋषि ने पापमोचनी एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से उनके पाप समाप्त हो गए और उनका तप फिर से जाग्रत हो गया। उसी प्रकार मंजुघोषा ने भी यह व्रत किया और पिशाचिनी रूप से मुक्त होकर पुनः अपना दिव्य रूप प्राप्त कर स्वर्ग लोक चली गई।
महर्षि लोमश ने अंत में राजा मांधाता से कहा कि पापमोचनी एकादशी का व्रत करने और इसकी कथा सुनने से मनुष्य के बड़े-बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत का फल हजार गौदान के बराबर माना गया है। इससे ब्रह्म हत्या, स्वर्ण चोरी, मद्यपान और अन्य गंभीर पापों का भी नाश होता है तथा अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है।



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