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Parshuram Jayanti 2023: परशुराम जयंती की तिथि-मुहूर्त के साथ जानें वो कथा जब उन्होंने तोड़ा गणेश जी का एक दांत
विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम का जन्मदिन अक्षय तृतीय के दिन मनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन से त्रेता युग का प्रारंभ हुआ था और महर्षि वेद व्यास ने महाभारत लिखना शुरू किया था।
परशुराम जयंती कई मायनो में काफी महत्व रखता है। आइये जानते हैं भगवान परशुराम की दिलचस्प कथा और परशुराम जयंती के दिन पूजा का मुहूर्त और महत्व।

भगवन परशुराम बहुत जल्द क्रोधित हो जाते थे। स्वाभाव से काफी निडर साहसी और शूरवीर थे। इनके बारे में कहा जाता है कि ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बाद भी इनका स्वाभाव ब्राह्मणों जैसा नहीं बल्कि क्षत्रियों जैसा था। इसके पीछे एक कहानी है।
ब्राह्मण होकर भी परशुराम का स्वभाव क्षत्रियों जैसा क्यों?
भगवान परशुराम के पिता थे महर्षि जमदग्नि। इनकी पत्नी थी रेणुका। एक बार जमदग्नि की पत्नी रेणुका और ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की माता दोनों को पुत्र रत्न की प्राप्ति हेतु प्रसाद मिला। देव शास्त्र ने इन प्रसादों को बदल दिया। जो प्रसाद रेणुका के लिए था वो विश्वामित्र की माता को मिल गया और विश्वामित्र की माता का प्रसाद रेणुका को मिल गया। इसलिए जब रेणुका को पुत्र हुआ तो ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होने के बाद भी उनका स्वाभाव क्षत्रियों जैसा रहा और विश्वामित्र क्षत्रिय कुल में उत्पन्न होकर भी ब्रह्मर्षि बन गए।
परशुराम ने तोड़ा गणेश का एक दांत
असुरो और दुष्टों का संहार करने के लिए एक बार शिव ने परशुराम को भेजा था। परशुराम के पराक्रम को देख शिव इतने खुश हुए कि उन्होंने एक फरसा उपहार स्वरुप दिया। उसी दिन से इनका नाम परशुराम पड़ा क्योंकि परसु मतलब फरसा होता है। एक बार परशुराम शंकर भगवान् से मिलने कैलाश गए। चूँकि उस समय शिव जी ध्यान मग्न थे तो गणेश जी ने परशुराम को रोक दिया। इससे क्रोधित परशुराम ने गणेश पर फरसा से वार कर दिया। अब चूँकि फरसा पिता शिव द्वारा दिया गया था तो उसका वार खाली कैसे जाता? ये सोचकर गणेश जी ने उस वार को अपने एक दांत पर ले लिया। इस प्रहार से गणेश जी का एक दांत टूट गया और वो एकदन्त कहलाये।
परशुराम जयंती पूजा महत्व एवं मुहूर्त
भगवान परशुराम का जन्म वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन हुआ था। इस दिन को अक्षय तृतीया भी कहते हैं। इस दिन व्रत करने और परशुराम की पूजा करने से पुत्र प्राप्ति का वरदान मिलता है। सच्चे मन से प्रार्थना करने वाले भक्त ब्रह्मलोक में स्थान पाते हैं और अगला जन्म किसी राजा के घऱ में होता है।
हाथ में फूल और अक्षत लेकर परशुराम का ध्यान करते हुए इस मंत्र से पूजा करें-
" मम ब्रह्मत्व प्राप्तिकामनया परशुराम पूजनमहं करिष्ये "
परशुराम जयंती 2023 पूजा मुहूर्त
परशुराम जयंती इस साल 22 अप्रैल को पड़ रही है।
वैसाख शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि का प्रारंभ- 22 अप्रैल 2023, शनिवार को सुबह 07:49
वैसाख शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि समाप्त- 23 अप्रैल 2023, रविवार को सुबह 07:47
नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।



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