पूजा-पाठ करते हैं, मगर छल-कपट और मांसाहार का सेवन भी करते हैं, ऐसे लोगों के लिए प्रेमानंद जी क्या कहते हैं

वृंदावन वाले प्रेमानंद महाराज जी बहुत ही सरल एवं सहज प्रवक्ता है। इनके सत्संग को सुनने के लिए देश ही नहीं अपितु विदेशों के कोने-कोने से लाखों की संख्या में लोग पहुंचते हैं। प्रेमानंद महाराज जी प्रातः काल 2:00 बजे वृंदावन की गलियों में भ्रमण के लिए निकलते हैं। इस दौरान महाराज जी के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं की अपार भीड़ जमा रहती है।

Puja Karne wale Log Alcohol or Non Veg Khate Hai toh kya hota hai

सत्संग के दौरान महाराज जी से एक भक्त ने सवाल किया कि जो लोग पूजा पाठ करते हैं और साथ ही झूठ, छल, कपट तथा मांस मदिरा का भी सेवन करते हैं उनका क्या?

Premanand Ji Maharaj Pravachan Puja Karne wale Log Alcohol or Non Veg Khate Hai toh kya hota hai

प्रेमानंद महाराज जी बड़ी ही मधुरता पूर्वक इस सवाल का जवाब देते हुए कहते हैं कि उस पूजा का कोई महत्व नहीं है। वह व्यक्ति जितना भी तन मन धन से पूजा करे उसकी पूजा सामर्थ नहीं रहेगी। महाराज जी कहते हैं कि राक्षस भी पूजा करते थे लेकिन उनकी पूजा अमंगलकारी होती थी।

द्रोह न करें

प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि भले ही आप पूजा अर्चना न करें। लेकिन आप किसी की भावनाओं को ठेस न पहुंचाएं, न ही किसी की अवहेलना करें, ना किसी के प्रति छल कपट करें, ना किसी के साथ द्रोह करें, ना ही किसी के साथ कपट करें, ना ही किसी को कष्ट पहुंचाएं।

वह नाटक है

प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि जो भी व्यक्ति मांस मदिरा तथा अन्य दुराचारी दुर्गुणों से परिपक्व है तो ऐसे व्यक्ति की पूजा नाटक है। उसकी पूजा एक दिखावा मात्र ही है।

सद्विचार

प्रेमानंद महाराज जी के अनुसार पूजा का शाब्दिक अर्थ है सदाचरण करना, सद्विचार करना, सद्भाव करना। सरल सहज रूपी अपने व्यवहार को बनाए रखना।

पवित्र आचरण

प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि हमारा व्यवहार ही हमारा आभूषण है। हमें हमारा आचरण पवित्र रखना चाहिए जिससे हमारी भक्ति स्वीकार हो सके।

छल कपट

महाराज जी कहते हैं कि एक घंटा भगवान ठाकुर जी के समक्ष भक्ति की और बाहरी दुनिया में आप छल कपट से लिप्त रहे, तो यह भक्ति कुछ काम की नहीं है।

चैतन्य

महाराज जी कहते हैं कि जो भगवान ठाकुर जी में चैतन्य विराजमान है वही चैतन्य सभी मानव रूपी शरीर तथा अंतरात्मा में विराजमान है।

अधर्म आचरण

शीतल मन एवं पवित्र भाव से पूजा एवं भक्ति होती है। अधर्म आचरण, छल कपट, हिंसा करने वालों की अंतरात्मा में यह भाव रहता ही नहीं है।

भगवान की पूजा

प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि सच्चे मन तथा श्रद्धापूर्वक भगवान की पूजा की जाए तो पाप और पुण्य दोनों नष्ट होकर वह मंगलमय भगवान की प्राप्ति के अधिकारी बन सकते हैं।

नोट: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। बोल्डस्काई लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी और धारणा को अमल में लाने या लागू करने से पहले कृपया संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।

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