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Rishi Panchami Vrat Katha: ऋषि पंचमी पर जरूर पढ़ें यह व्रत कथा, तभी मिलेगा पूजा का पूर्ण फल
Rishi Panchami Vrat Katha: हिंदू धर्म में भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी का पर्व मनाया जाता है। यह त्योहार गणेश चतुर्थी के अगले दिन आता है। पंचांग के अनुसार, इस साल ऋषि पंचमी 15 सितंबर 2026, मंगलवार को मनाई जाएगी। इस दिन सप्तऋषियों की पूजा करने की परंपरा है। मान्यता है कि ऋषि पंचमी का व्रत करने से व्यक्ति को जाने-अनजाने में किए गए पापों और गलतियों से मुक्ति मिलती है। व्रती इस दिन सप्तऋषियों की पूजा करके अपने दोषों के लिए क्षमा मांगते हैं और सुख-शांति की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को श्रद्धा से करने पर जीवन में सफलता और खुशहाली आती है। ऋषि पंचमी की पूजा के बाद व्रत कथा पढ़ने का भी विशेष महत्व है। माना जाता है कि कथा के बिना व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता। ऐसे में, आइए जानते हैं ऋषि पंचमी की पौराणिक व्रत कथा -

ऋषि पंचमी व्रत कथा (Rishi Panchami Vrat Katha In Hindi)
पौराणिक कथा के अनुसार, विदर्भ देश में उत्तंक नाम के एक विद्वान और सदाचारी ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी का नाम सुशीला था, जो बहुत ही पतिव्रता और धार्मिक महिला थीं। उनके एक बेटा और एक बेटी थी। जब बेटी विवाह योग्य हुई तो उत्तंक ने उसका विवाह अच्छे और संस्कारी परिवार में कर दिया। लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही दुर्भाग्य से वह विधवा हो गई।
पति की मृत्यु के बाद बेटी अपने माता-पिता के साथ रहने लगी। बेटी के जीवन में आए इस दुख से उत्तंक बहुत परेशान रहते थे। उन्होंने अपना घर-बार बेटे को सौंप दिया और पत्नी व बेटी के साथ गंगा नदी के किनारे रहने लगे। वहीं वे अपने शिष्यों को वेदों की शिक्षा देने लगे।
एक दिन उनकी बेटी सो रही थी। अचानक उसके पूरे शरीर पर छोटे-छोटे कीड़े दिखाई देने लगे। यह देखकर वह बहुत घबरा गई और उसने अपनी मां सुशीला को पूरी बात बताई। सुशीला ने भी यह देखकर चिंता जताई और अपने पति से इसका कारण पूछा। उन्होंने कहा, "मेरी बेटी ने ऐसा कौन सा पाप किया है, जिसकी वजह से उसे इतना कष्ट सहना पड़ रहा है?"
उत्तंक ने ध्यान लगाकर बेटी के पिछले जन्म के बारे में पता लगाया। उन्होंने बताया कि पिछले जन्म में भी उनकी बेटी एक ब्राह्मणी थी। उस जन्म में जब वह रजस्वला हुई थी, तब उसने अनजाने में घर के बर्तनों को छू लिया था। इसके अलावा उसने अपनी सखियों को ऋषि पंचमी का व्रत करते हुए देखा था, लेकिन खुद इस व्रत का पालन नहीं किया और उसका अनादर किया।
उत्तंक ने बताया कि इसी कारण उसे इस जन्म में भी कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, पिछले जन्म में उसने ऋषि पंचमी के व्रत का उत्सव देखा था। इस पुण्य के कारण ही उसका जन्म इस बार एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। लेकिन व्रत का अनादर करने के कारण उसे इस तरह के कष्ट भोगने पड़े।
यह बात सुनकर सुशीला ने अपने पति से ऋषि पंचमी व्रत के बारे में विस्तार से बताने का आग्रह किया। तब उत्तंक ने कहा कि ऋषि पंचमी एक बहुत ही पुण्यदायी व्रत माना जाता है। श्रद्धा के साथ इस व्रत को करने से व्यक्ति को अपने पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन के कई दुख दूर होते हैं। धार्मिक मान्यता है कि महिलाओं को इस व्रत से सुख, सौभाग्य और परिवार की खुशियां प्राप्त होती हैं।



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