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Shani Pradosh Vrat Katha: शनि प्रदोष व्रत के दिन जरूर पढ़ें ये कथा, जिससे दूर होगी सारी परेशानियां
Shani Pradosh Vrat Katha In Hindi: शास्त्रों के अनुसार, प्रदोष व्रत महादेव को प्रसन्न करने का सबसे उत्तम दिन है, लेकिन जब यह शनिवार को पड़ता है, तो इसका महत्व अनंत गुना बढ़ जाता है। शनि प्रदोष व्रत न केवल कर्ज और दरिद्रता से मुक्ति दिलाता है, बल्कि कुंडली में मौजूद शनि दोष, साढ़े साती और ढैय्या के कष्टों को भी शांत करता है। मान्यता है कि जो भक्त इस दिन प्रदोष काल में भगवान शिव की आराधना कर इस पौराणिक कथा का श्रवण करते हैं, भोलेनाथ उनके जीवन के सभी संकट हर लेते हैं।
भक्त इस दिन भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं बिना कथा और आरती के व्रत का फल अधूरा ही मिलता है। ऐसे में जरूरी है कि आप जिस तरह सच्चे मन से व्रत रख रहे हैं उसी तरह कथा भी अवश्य पढ़ें। आइए जानते हैं शनि प्रदोष व्रत की संपूर्ण कथा, विधि और आरती।

शनि प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा (Vrat Katha)
प्राचीन काल में एक दरिद्र ब्राह्मण रहता था, जिसकी मृत्यु के बाद उसकी पत्नी और पुत्र भिक्षा मांगकर जीवन यापन करते थे। एक दिन वे भिक्षा लेकर लौट रहे थे, तो उन्हें वन में विदर्भ देश का राजकुमार मिला, जो अपने पिता की मृत्यु और शत्रुओं के कब्जे के बाद भटक रहा था। ब्राह्मणी ने दयावश उसे अपने साथ रख लिया।
कुछ समय बाद, वे दोनों बालक (ब्राह्मण पुत्र और राजकुमार) वन में घूम रहे थे, जहां उनकी भेंट 'गंधर्व कन्याओं' से हुई। राजकुमार 'अंशुमती' नामक गंधर्व कन्या पर मोहित हो गया। गंधर्व राज को जब पता चला कि वह विदर्भ का राजकुमार है, तो उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह उससे कर दिया।
राजकुमार ने गंधर्व सेना की मदद से विदर्भ पर पुनः अधिकार कर लिया और ब्राह्मण पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया। यह सब उस प्रदोष व्रत का फल था, जो ब्राह्मणी ने पूरी श्रद्धा से किया था। तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि शनि प्रदोष व्रत करने से खोया हुआ वैभव वापस मिल जाता है और हर संकट दूर होता है।

शनि प्रदोष व्रत पूजा विधि (Puja Vidhi)
स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र (संभव हो तो सफेद या हल्के रंग के) धारण कर व्रत का संकल्प लें।
शिव मंदिर दर्शन: सुबह भगवान शिव के मंदिर जाकर जल अर्पित करें।
प्रदोष काल पूजा: प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा सूर्यास्त से 45 मिनट पहले और 45 मिनट बाद की जाती है।
अभिषेक: शाम को पुनः स्नान कर भगवान शिव का दूध, दही, घी, शहद और शक्कर (पंचामृत) से अभिषेक करें।
सामग्री: बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, भस्म और अक्षत अर्पित करें।
शनि देव की पूजा: चूंकि यह शनि प्रदोष है, इसलिए शाम को पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं और शनि देव के मंत्रों का जाप करें।
कथा श्रवण: पूजा के बाद ऊपर दी गई शनि प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें या सुनें।
भगवान शिव की आरती (Shiv Ji Ki Aarti)
जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ जय शिव...
एकानन चतुरानन पंचानन राजे। हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ जय शिव...
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे। तीनों रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॐ जय शिव...
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी। चंदन मृगमद सोहे भाले शशिधारी ॥ ॐ जय शिव...
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ जय शिव...
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता। जगकर्ता जगभर्ता जगपालनकर्ता ॥ ॐ जय शिव...
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका ॥ ॐ जय शिव...
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी। नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॐ जय शिव...
त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ जय शिव...



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