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Why Durga idols are made from brothel soil : देशभर में नवरात्रि की तैयारियाँ जोरों पर हैं। इस साल शारदीय नवरात्रि 22 सितंबर से शुरू हो रही है। नवरात्रि के नौ दिन देवी के नौ स्वरूपों की पूजा और आराधना के लिए समर्पित होते हैं। पूरे भारत में यह पर्व भव्यता और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, लेकिन पश्चिम बंगाल में इसका उत्सव अपनी अलग पहचान रखता है। जैसे मुंबई गणेशोत्सव के लिए प्रसिद्ध है, उसी तरह बंगाल में दुर्गा पूजा की धूम पूरे देश में मशहूर है।
बंगाल में दुर्गा पूजा मुख्यतः नवरात्रि के छठे दिन से शुरू होती है और दशहरा के दिन इसका समापन होता है। इस दौरान मां दुर्गा के महिषासुर मर्दिनी स्वरूप की भव्य मूर्ति बनाकर उसकी पूजा की जाती है। बंगाल में बनाई जाने वाली मां दुर्गा की मूर्तियों का स्वरूप सामान्य मूर्तियों से अलग होता है। तीखे नयन, आकर्षक चेहरे और घुंघराले काले बाल इन मूर्तियों की खासियत होते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सिर्फ स्वरूप ही नहीं, बल्कि मूर्ति बनाने का तरीका भी विशेष है।

दरअसल, बंगाल में मां दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए वेश्याओं के घर की मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। इसे "Vaishyalaya Ki Mitti" या वेश्यालय की पवित्र मिट्टी कहा जाता है। इस परंपरा का चित्रण फिल्म "देवदास" में भी किया गया है। आज भी कोलकाता और आसपास के इलाकों में यह परंपरा चली आ रही है। खासकर कोलकाता के कुमारतुली क्षेत्र में मूर्ति निर्माण के लिए वेश्यालय की मिट्टी का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से जरूरी माना जाता है। आइए जानते हैं इस परापंरा से जुडी मान्यता और इतिहास के बारे में।
क्यों मानी जाती है पवित्र मिट्टी?
ऐसा माना जाता है कि जब कोई व्यक्ति किसी वेश्या के घर में कदम रखता है, तो अपने सारे पुण्य और पवित्रता बाहर ही छोड़ देता है। इससे उस घर की मिट्टी पवित्र बन जाती है। इस परंपरा का संबंध भगवान श्रीराम से भी जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि भगवान राम ने रावण के साथ युद्ध से पहले देवी दुर्गा का आशीर्वाद लेने के लिए अपनी मूर्ति बनाने के लिए वेश्या अम्बालिका के घर की मिट्टी का इस्तेमाल किया था।
सिर झुकाकर मांगी जाती है मिट्टी
मिट्टी लेने के लिए पुजारी वेश्याओं के घर जाकर अनुमति मांगते हैं। तभी उन्हें वह मिट्टी दी जाती है। यह समाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्ष भर समाज में जिन्हें अपमान का सामना करना पड़ता है, उनके घर की मिट्टी से मूर्ति बनाने की परंपरा उन्हें सम्मान और मान्यता देती है। इसे एक संदेश के रूप में भी देखा जाता है कि नारी शक्ति का सम्मान हर वर्ग के लोगों के लिए समान है।
परंपरा की शुरुआत और मान्यता
इस परंपरा की शुरुआत वसंत ऋतु में बसंती पूजा से हुई थी, लेकिन शरद ऋतु में इसे भगवान राम द्वारा युद्ध से पहले देवी दुर्गा के आशीर्वाद के लिए अपनाया गया। इसके अलावा एक प्रचलित मान्यता के अनुसार, एक वेश्या देवी दुर्गा की अत्यंत भक्त थी। समाज से तिरस्कार मिलने के बावजूद उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां दुर्गा ने वरदान दिया कि उसकी मूर्ति केवल उसी मिट्टी से बनेगी। इस परंपरा के अनुसार, जब तक वेश्यालय की मिट्टी का उपयोग नहीं किया जाएगा, मूर्ति में मां दुर्गा का वास नहीं होगा।
यह परांपरा देती है सम्मानता का संदेश
इस प्रकार, वेश्यालय की मिट्टी से मूर्ति बनाने की परंपरा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी समानता और सम्मान का संदेश देती है। यह दर्शाता है कि नारी शक्ति का सम्मान समाज के हर वर्ग के लिए आवश्यक है और श्रद्धा का कार्य किसी की सामाजिक स्थिति पर निर्भर नहीं करता।
इस नवरात्रि, जब आप बंगाल की भव्य दुर्गा पूजा के दृश्य देखेंगे, तो इस अनोखी और विशेष परंपरा के महत्व को समझना भी उतना ही जरूरी है जितना कि पूजा का उत्सव।



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