शनि जयंती के दिन करें दशरथ स्तोत्र का जाप, हर कष्ट से मिलेगी मुक्ति

हिंदू धर्म में शनि देव को न्याय का देवता कहा जाता है। कुंडली में अशुभ स्थान में बैठे शनि के कारण जातक को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है। आज है शनि जयंती

By Super Admin

हिंदू धर्म में शनि देव को न्याय का देवता कहा जाता है। कुंडली में अशुभ स्थान में बैठे शनि के कारण जातक को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है। शनि देव के जन्म अवसर को शनि जयंती के रूप में मनाया जाता है। शनि जयंती हर साल ज्येष्ठ अमावस्या के दिन मनाई जाती है। और आज है ज्‍येष्‍ठ अमावस्‍या।

शनि जयंती के दिन शनि देव की विशेष आराधना की जाती है। मान्यता है कि इस दिन शनि देव की पूजा से सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।

कुंडली में शनि की दशा के दौरान जातक को अनेक कष्टोंं का सामना करना पड़ता है। माना जाता है कि शनि की दशा के दौरान स्वयं भगवान शिव को भी भिक्षा मांगनी पड़ी थी। शनि दशा के कुप्रभाव में जातक को कई तरह के नुकसान और हानि से गुज़रना पड़ता है। इस दौरान उसका जीवन नर्क के समान हो जाता है। लेकिन फिर भी ऐसा कहना बिलकुल गलत होगा कि शनि दशा के दौरान सिर्फ अशुभ फल्‍ा ही प्राप्ति होते हैं। जन्मकुंडली में शनि के शुभ स्थान में बैठने या प्रबल होने पर जातक को शनि दशा के दौरान बहुत अच्छे फल मिलते हैं लेकिन ऐसा कम ही देखा जाता है। शनि देव की पूजा करने से आपको उनकी कृपा प्राप्त हो सकती है। ज्योतिषशास्त्र में शनि देव को प्रसन्न करने के लिए कई उपाय बताए गए हैं।

Dasharatha’s Shani Stotra

अगर आप शनि के अशुभ प्रभाव, शनि की दशा से गुज़र रहें हैं तो इससे मुक्ति पाने के लिए शनि जयंती का दिन अत्यधिक शुभ और मंगलकारी है। अगर आपको नहीं पता कि आप शनि दशा या शनि के अशुभ प्रभाव से पीडित हैं तो इन संकेतों के द्वारा आप इसके बारे में पता लगा सकते हैं। अगर आप विद्यार्थी हैं तो कड़ी मेहनत के बाद भी आपको परीक्षा में अनुकूल अंक प्राप्त नहीं हो पाते हैं। ऐसा शनि देव के अशुभ प्रभाव की वजह से होता है। वहीं अगर ऑफिस में आपके काम को प्रोत्साहन या पहचान नहीं मिल पाती हैं तो इसका भी कारण शनि की अशुभ दशा हो सकती है। जोड़ों में दर्द भी शनि के कुप्रभाव के कारण होता है। अगर आपके जूते-चप्पल खो जाते हैं या जल्दी टूट जाते हैं तो ये भी शनि की दशा का संकेत होता है।

Dasharatha’s Shani Stotra

अगर आपको अचानक आलस या सुस्ती महसूस होती है या फिर आप अपने काम को एकाग्रता से नहीं कर पाते हैं तो इसके पीछे का कारण शनि की दशा हो सकती है। शनि की दशा के प्रभाव की पुष्टि करने के लिए आप अपनी कुंडली किसी अच्छेी ज्योतिषी को अवश्य दिखाएं।

दशरथ की शनि कथा

चलिए आगे बात करते हैं दशरथ शनि स्तोत्र और इसके महत्व के बारे में। कहा जाता है हर 30 साल के बाद शनि रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है। ये समय बहुत दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है। ये समय राजाओं और उनके देशों के लिए बहुत अशुभ माना जाता है। शनि के इस गोचर के कारण किसी राजा की मृत्यु, तख्तापलट, बाढ़, सूखा या अन्य किसी वजह से देश का विनाश संभव है। किवदंती है कि जब राजा दशरथ अयोध्या के शासक थे तब उन्होंने शनि स्तोत्र का जाप किया था। इस स्तोत्र के जाप से शनि देव अत्यंत प्रसन्न हुए थे और उन्होंने राजा दशरथ और उनकी अयोध्या नगरी को अपने प्रकोप से मुक्त कर दिया था। उस समय शनि देव रोहिणी नक्षत्र में गोचर कर रहे थे। इसी के बाद से इस स्तोत्र का नाम दशरथ स्तोत्र पड़ गया।

Dasharatha’s Shani Stotra

नीचे हम आपको दशरथ स्तोत्र के बारे में बता रहे हैं। जो लोग शनि के कुप्रभाव ये पीडित हैं उन्हें शनि के इस स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। इस स्तोत्र के प्रभाव से आपको शनि दोष और इसके अशुभ प्रभावों से मुक्ति मिलेगी।

ध्यात्वार सरसवतिम देवीं गनानथम विनायकं

राजा दशरथाह स्तोत्रम् सौरेरिधमथकरोथ।

नमो नीला मयूखया नीलोथपला निभया छा,

नमो निर्मांसा धीहया दीर्घा श्मा,श्रु जताया छा,

नमो विशाला नेत्रराया शुषकोध्रा भयानका नम: पुरुषगथराया स्थू,लरोमाया वई नम: नमो निथ्येम शुधरथाया निथ्यपथपथाया वई नम: नम: कालाग्नि रूपाया रथांथका नमोस्तु्ते,

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नमस्ते कोटाराकशाया दुर्निरिक्या मया वई नम: नमो घोराया रौद्राया भीषनाया करालिन नमसते सर्व भाक्शाया वलीमुखा नमोस्तु्ते सूर्य पुत्र नमस्तेथष्ठुर भास्करे भया ध्याषका अधो-द्रुष्टेस नमस्तुकभ्यंभ वपुहश्या‍मा नमोस्तु ते नमो मंद-गाथे तुभ्यं निष्ठ्रिंशाया नमो नम: थापसा दग्धा -देहाया निथ्यनम् योगरथाया छा नमस्ते ग्यामना नेथराया कश्य‍पथ्माठजा सुनावे थुष्टो ददासी वई राज्यम् रूष्टो हरासि थाथशनाथ देवासुरा मनुष्यातश्चाद पसुपक्षीसरिसरप्राह थवाया विलोकिथाह साउरे देनयामाशु व्रजांति छा ब्रह्मा शाक्रो यमशछईवा ऋष्यामह सप्था-थराकाह राज्य भ्रष्टाोश्छोते सर्वे थवा द्रष्ट्या द्रुष्टानह कश्यम गच्छ नति थथ शनाथ प्रसादम् कुरु में सौरे वरारथेहम थवाश्रीथाह सौरे शामास्वाटापाराधम् सर्वभूतहा ह्रदयाछा।।

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