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शून्यता न कि धार्मिकता

चाइना का सम्राट वू, एक सच्चा बौद्धधर्मी, बौद्ध धर्म का पालन करते हुए अपने आप को श्रेष्ठ कामों में व्यस्त रखता था जैसे मंदिर और मठ खड़े करना, साधुओं को शिक्षा देना और परोपकारी कार्यों में शामिल होना।
सम्राट ने एक दिन बोधिधर्म, महान बौद्ध गुरु से पूछा: "मेरे अच्छे कार्यों के क्या महत्व हैं?" उसे अचरज हुआ जब मास्टर ने जवाब दिया "कुछ भी नहीं"। सम्राट ने फिर पूछा " धर्मात्मा की वस्तुता का असली मतलब क्या है?" मास्टर ने संशोधित करते हुए कहा "शून्यता न कि धार्मिकता"। सम्राट ने फिर पूछा "मेरा सामना कौन कर रहा है?" मास्टर ने जवाब दिया "मुझे नहीं पता"।
सम्राट को यह शिक्षा पकड़ में नहीं आई जो काफी बुनियादी थी पर छिपी हुई मालूम पड़ रही थी। क्योंकि वह बोधिधर्म के शब्दों में सच्चाई को नहीं समझ सका, सम्राट ने राज्य छोड़ दिया।
बाद में सम्राट वू ने इस वार्तालाप को एक सलाहकार युवराज शिको के सामने रखा जिन्होंने सम्राट को बोधिधर्म के बड़प्पन को समझाते हुए धिक्कारा, क्योंकि बोधिधर्म के पास परम सच की जानकारी थी। सम्राट को अफसोस हुआ और उसने एक दूत को बोधिधर्म को विनती कर राज्य में वापस लाने को भेजा। पर युवराज शिको ने कहा "इस भूमि के सभी लोग चले गए तब भी वह नहीं लौटेंगे।"



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