चरम एकाग्रता और प्रबुद्धता

Extreme Concentration
चरम एकाग्रता, आत्‍मज्ञान का बोध करा सकती है। एक छोटी जैन कहानी इसी सत्‍य को दर्शाती है। एक जैन साधक, कोआन एक जवाब के लिए कठिन परिश्रम कर रहा था। उसने कड़ी मेहनत की लेकिन जवाब प्राप्‍त नहीं कर सका। वह डर से जकड़ा हुआ था कि उसके गुरू अवश्‍य ही इस असफलता के लिए दंड देगें।

जैन शिक्षक ऐसे मुद्धों पर बहुत ही गंभीर होते है और छात्रों की धड़कन रूकने तक उनसे प्रयास करवा सकते हैं। साधक ने पुन: कोआन के लिए प्रयास किया, उस पर ध्‍यान केन्द्रित किया और अन्‍त में थक कर सो गया। उसने एक सपना देखा। सपने में जैन गुरूओं के गुरू बोधिधर्म को देखा, उनके बड़े चेहरे और ड़रावनी ऑखों को देखा। यह कहा जाता है कि बोधिधर्म का चेहरा बहुत खतरनाक है।

साधक, बोधिधर्म की डरावनी ऑखों से बहुत डर गया और उसकी नींद खुल गई। साधक केवल साधारण नींद से नहीं बल्कि सोई हुई जिंदगी से जागा था। यह एक शाश्‍वत जागृति थी। इस प्रकार वह प्रबुद्ध बन गया और उसके डर ने उसे नई दिशा दी। जैन गुरू के चरम एकाग्रता के अभ्‍यास ने उन्‍हे प्रबुद्ध बना दिया।

एकाग्रता भरी साधना की इस प्रक्रिया में उचित परिणाम हासिल हो ही जाता है। ओशो कहते है कि सच्‍चा मार्ग, जवाब पाना नहीं बल्कि उसे समझना भी है। समझने की प्रक्रिया में, प्रश्‍न खो जाता है और अचानक से कुछ प्रकट हो जाता है, वही विषय का असली जवाब है।

Story first published: Saturday, August 25, 2012, 8:08 [IST]
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