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Mudiya Purnima 2022: गोवर्धन में निकलेगी 2 साल बाद मुड़िया शोभायात्रा, जानें इससे जुड़ा इतिहास
गोवर्धन में राजकीय मुड़िया पूर्णिमा मेले का भव्य आगाज हो चुका है। साल 2022 में 10 जुलाई से शुरू हुआ ये मेला 14 जुलाई को समाप्त होगा। इस मेले में बड़ी तादाद में लोग शामिल हो रहे है। हर वर्ष लगने वाला गोवर्धन का मुड़िया पूर्णिमा मेला कोरोना के कारण 2 वर्षों तक बंद रहा। अब 2 वर्ष के बाद भक्तों को अपने आराध्य ठाकुर गिरराज महाराज के दर्शन और परिक्रमा का सौभाग्य मिल पाया है। तो आइए जानते है मुड़िया मेले का इतिहास और गोवर्धन परिक्रमा का महत्व।

मुड़िया पूर्णिमा मेले का इतिहास
आषाढ़ पूर्णिमा को ही मुड़िया पूर्णिमा कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार पश्चिम बंगाल के रामकेली गांव, मालदा के रहने वाले सनातन गोस्वामी, पश्चिम बंगाल के राजा हुसैन शाह के यहां मंत्री पद पर कार्य करते थे। चैतन्य महाप्रभु की भक्ति से प्रभावित होकर सनातन गोस्वामी उनसे मिलने वाराणसी आ गए। चैतन्य महाप्रभु की प्रेरणा से ब्रजवास कर वे भगवान कृष्ण की भक्ति करने लगे।
वे वृंदावन से हर दिन गिरिराज पर्वत की परिक्रमा करने गोवर्धन आते थे। मान्यता है कि सनातन जब वृद्ध हो गए, तो गिरिराज प्रभु ने उनको दर्शन देकर शिला ले जाकर परिक्रमा लगाने को कहा। महाप्रभु मंदिर के मुड़िया महंत गोपाल दास के अनुसार,वर्ष 1556 में सनातन गोस्वामी के गोलोक गमन हो जाने के बाद गौड़ीय संत एवं ब्रजजनों ने सिर मुड़वाकर उनके पार्थिव शरीर के साथ सात कोसीय परिक्रमा लगाई। तभी से गुरु पूर्णिमा को मुड़िया पूर्णिमा के नाम से जाना जाने लगा।

गोवर्धन परिक्रमा का विशेष महत्व
इस पांच दिवसीय मेले में गिरिराजजी की इक्कीस किमी परिक्रमा की जाती है। इस समय मार्ग में पांच दिनों तक अटूट मानव श्रृंखला का नजारा देखते ही बनता है। ये मेला गौड़ीय संत सनातन की स्वर्णिम भक्ति का दिव्य इतिहास समेटे है। धार्मिक इतिहास के पन्नों पर गोवर्धन महाराज की भक्ति बिखेरती भक्त सनातन की परंपरा की मुड़िया शोभायात्रा साल 2022 में 13 जुलाई को निकाली जाएगी। जिसके तहत सनातन परंपरा के प्रमुख संत मंदिर प्रांगण में एकत्रित होकर सिर मुड़वाएंगे, उसके बाद मानसीगंगा में स्नान कर सनातन गोस्वामी के चित्रपट के साथ मानसीगंगा की परिक्रमा लगाएंगे। हालांकि बदलते वक्त के परिदृश्य में अब दो स्थानों से मुड़िया शोभायात्रा निकाली जाती हैं।
सुबह राधा श्याम सुंदर मंदिर के महंत रामकृष्ण दास के नेतृत्व में और शाम को महाप्रभु मंदिर के महंत गोपालदास के नेतृत्व में। दोनों शोभा यात्राओं में करीब पांच सौ संत सहभागिता करते हैं। खास बात ये है कि गौड़ीय परंपरा के विदेशी भक्त और महिला भक्त भी इस परंपरा में शामिल होने आते है।



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