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समुद्र मंथन में निकले अमृत कलश से जुड़ा है कुम्भ का रिश्ता!

कुम्भ मेला एक ऐसा मशहूर धार्मिक कार्यक्रम है जिसमें देश विदेश के सैकड़ों भक्त अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए आते हैं। इस बार कुम्भ मेला उत्तर प्रदेश के प्रयागराज संगम पर आयोजित हो रहा है।

भारत में कुम्भ मेले का आयोजन चार अलग अलग स्थान पर हर तीन साल के अंतराल पर होता है। कुम्भ पवित्र नदी के तट पर मनाया जाता है और ये चार धार्मिक स्थान है- प्रयागराज में संगम जहां गंगा, यमुना और सरस्वती नदियां मिलती हैं, हरिद्वार में गंगा, नासिक में गोदावरी और उज्जैन में शिप्रा।
इन सभी में प्रयाग के कुम्भ को काफी ज़्यादा खास माना जाता है। इस लेख के ज़रिए जानते हैं हर तीन साल में लगने वाले कुम्भ के इतिहास के बारे में।

कब से हुई कुम्भ मेले की शुरुआत
कुम्भ का संस्कृत अर्थ है कलश और यदि आप ज्योतिष शास्त्र में देखेंगे तो कुम्भ राशि के लिए भी यही चिह्न है। लिखित प्रमाण के रूप में इसकी कहीं निश्चित तारीख नहीं है लेकिन माना जाता है कि इसका इतिहास कम से कम 850 साल पुराना है तथा इसका आरंभ आदि शंकराचार्य ने किया था।
वहीं दूसरी तरफ कई लोग इसकी शुरुआत को समुद्र मंथन के समय से जोड़ कर देखते हैं। देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था जिसके बाद अमृत कलश बाहर निकला। माना जाता है कि इस कलश में से अमृत की बूंदें हरिद्वार, इलाहबाद, उज्जैन और नासिक में गिरी थी और ये सभी वो स्थान बनें जहां हर तीन वर्ष में कुम्भ मेले का आयोजन होता है। पूरे 12 वर्षों के बाद चक्र पूरा होता है और कुम्भ अपने पहले स्थान पर वापस पहुंचता है।

कुम्भ मेले के आयोजन में कुछ ग्रहों की भूमिका है खास
यूं तो सौरमंडल में मुख्य ग्रहों की संख्या नौ है लेकिन कुम्भ मेले के आयोजन में सूर्य, चंद्र, गुरु और शनि को काफी अहम माना जाता है। इन ग्रहों की खास स्थिति होने पर कुम्भ मेले का कार्यक्रम शुरू होता है। दरअसल जब समुद्र मंथन के बाद अमृत कलश निकला तब उसे हासिल करने के लिए देवताओं और राक्षसों के मध्य खींचातानी शुरू हो गयी।
इस झड़प के दौरान चंद्रमा ने अमृत को बहने से बचाया। गुरु ने दैत्यों से कलश को बचने के लिए उसे छिपा दिया। सूर्य देव ने कलश को टूटने से बचाया तो वहीं शनि देव ने इंद्र के कोप से रक्षा की। अमृत को बचाने में इन चारों ग्रहों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी इसलिए इन ग्रहों के खास संयोग बनने पर ही कुम्भ का आयोजन होता है।

हर तीन साल में होता है कुम्भ का आयोजन
गुरु ग्रह एक राशि में पूरे एक साल का वक़्त बिताता है। उसे सभी बारह राशियों का चक्र पूरा करने में 12 साल का समय लग जाता है। इस वजह से 12 वर्ष के बाद फिर उसी स्थान पर ही कुम्भ का आयोजन होता है। लेकिन इस बीच हर तीन साल के अंतराल में कुम्भ के लिए निर्धारित स्थानों पर इसका आयोजन होता है। महाकुम्भ का आयोजन 144 सालों के बाद होता है।



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